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स्ट्रोक (आघात)

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स्ट्रोक क्या है?

स्ट्रोक एक ऐसी स्थिति है जिसमें दिमाग का एक हिस्सा खून के बहाव में कमी तथा रक्त नलिकाओं के क्षतिग्रक्त होने के कारण कार्य करना बन्द कर देता है।

types-of-brain-strokeजब दिमाग में खून पहुँचाने वाली रक्त नलिकाओं में रूकावट के कारण स्ट्रोक होता है, तो उसे इस्कीमिक स्ट्रोक कहा जाता है। यह स्ट्रोक का सबसे सामान्य रूप है जोकि स्ट्रोक के सभी मामलों का लगभग 85 प्रतिशत है।

जब स्ट्रोक दिमाग में रक्त नलिकाओं के क्षतिग्रक्त होने के कारण होता है तब इसे हिमोरैजिक स्ट्रोक कहा जाता है। स्ट्रोक के सभी मामलों में इसका प्रतिशत अमेरिका, यूरोप और आस्ट्रेलिया में 10-15 प्रतिशत तथा एशिया में 20-30 प्रतिशत है। स्ट्रोक का यह प्रकार अत्यन्त गम्भीर परिणामों से जुड़ा है जिसमें 40-50 प्रतिशत मौतें इसी कारण होती हैं। कुछ लोगों में स्ट्रोक  24 घंटे के दौरान ( ज्यादातर 5 मिनट के अंदर) अपनें आप ही ठीक हो जाता है जिसे ट्रान्सियेंट इस्कीमिक अटैक- Transient Ischemic Attack (TIA) कहा जाता है। स्ट्रोक विश्व में मौतो का दूसरा सबसे सामान्य कारण है

यह समक्षना महत्वपूर्ण है कि स्ट्रोक को रोका जा सकता है तथा इसका इलाज भी किया जा सकता है:

80 प्रतिशत स्ट्रोक रोके जा सकते हैं।

स्ट्रोक से होने वाली मौत तथा विकलांगता से बचने के लिए जल्दी से जल्दी इलाज प्राप्त करना महत्वपूर्ण होता है।

इस्कीमिक स्ट्रोक के वह मरीज जिनका इलाज टीपीए (tPA) द्वारा होता है, उनमें पूर्ण रुप से ठीक होने की सम्भावना अधिक होती है।

स्ट्रोक कितना सामान्य है तथा इस बीमारी से अब तक कितने लोगों की मौत हुयी है?

स्ट्रोक की बीमारी विश्व में मौतों का दूसरा तथा भारत में तीसरा सबसे प्रमुख कारण हैं। लान्सेट जर्नल के आंकड़ों के अनुसार 2016 में भारत में लगभग 11 लाख लोग स्ट्रोक से प्रभावित हुये और लगभग 7 लाख लोगों की मौत इसके कारण हुयी। यह भी अनुमान लगाया गया है कि विश्व स्तर पर लगभग 1.3 करोड़ लोग स्ट्रोक से प्रभावित हुये और 55 लाख लोगों की मौत इसके कारण हुयी। वयस्कों में स्ट्रोक न्यूरोलोजिक विकलांगता का एक प्रमुख कारण है।

स्ट्रोक किन कारणों से होता है?

स्ट्रोक उस घटना के कारण होता है जिसमें दिमाग को खून पहुँचाने वाली नसें प्रभावित होती है। इसमें नसों में रूकावट पैदा हो सकती है या वह फट सकती है जिससे कारण दिमाग में खून फैल जाता है। दोनों स्थितियाँ दिमाग के एक हिस्से को नुकसान पहुँचाती हैं, परिणामस्वरुप वह हिस्सा काम करना बन्द कर देता है।

स्ट्रोक 3 प्रकार के होता हैं:

1. इस्कीमिक स्ट्रोक

2. हिमोरैजिक स्ट्रोक

3. ट्रान्सियेंट इस्कीमिक अटैक- Transient Ischemic Attack (TIA)

1. इस्कीमिक स्ट्रोक: यह 85 प्रतिशत मामलों में स्ट्रोक का सबसे सामान्य कारक है। इस्कीमिया नामक दिमाग की कोशिकाओं में खून की कमी के कारण इस्कीमिक स्ट्रोक होता है। खून की कमी नलियों में सिकुड़न तथा रूकावट पैदा करती है। यह रूकावट दो कारणों से होती है जोकि आगे इसे दो हिस्सों में बाँटती है:

• थ्रोम्बोटिक स्ट्रोक: यहाँ पर रूकावट तथा सिकुड़न नसों के अन्दर मौजूद फैटी प्लाक की जगह पर थक्के के जम जाने से होती है।

• इम्बोलिक स्ट्रोक: यहाँ पर रूकावट थक्के के एक जगह से दूसरी जगह पर जाने के कारण होता है जिसे इम्बोलस कहते है। यह दिल या बड़ी नस में होता जो खून को दिल से दिमाग तक पहुँचाती है। दिल या बड़ी नस में बना हुआ थक्का खून के साथ घूमता रहता है जब तक की वह दिमाग में एक छोटी नस तक नहीं पहुँच जाता, जहाँ पर वह अटक जाता है और खून की आपूर्ति में रुकावट पैदा करता है। इम्बोलस के होने का सबसे सामान्य कारण एट्रियल फिब्रिलेशन है जिसमें दिल अनियमित रुप से धड़कता है।

2. हिमोरैजिक स्ट्रोक: हिमोरैजिक स्ट्रोक, इस्कीमिक स्ट्रोक की तुलना में कम सामान्य है जिनके मामलें 10-30 प्रतिशत होते हैं। हाँलांकि यह सामान्यत: गम्भीर परिणामों से जुड़ा हुआ है जिसमें मौत की दर 40 से 54 प्रतिशत है। हिमोरैजिक स्ट्रोक दिमाग की नसों के फटने के कारण होता है। दिमाग की नस मुख्य तौर हाईपरटेंशन या एन्युरिस्म जैसी बीमारियों के कारण फट जाती हैं।

हिमोरैजिक स्ट्रोक भी दो प्रकार का होता है:

• इन्ट्रासेरेब्रल हिमोरैज: इस स्ट्रोक में खून की नस फट जाने के कारण दिमाग के अंदर खून जम जाता  है।

• सबआर्कनायड हिमोरैज: इस स्ट्रोक में खून की नस फट जाने के कारण दिमाग खून दिमाग की सतह पर जम जाता है।

3. ट्रान्सियेंट इस्कीमिक अटैक- Transient Ischemic Attack (TIA): इसे छोटा स्ट्रोक भी कहा जाता है। यह स्ट्रोक दिमाग की नस में अस्थायी रूकावट या खून के अतिरिक्त मार्गों के बन जाने के कारण होता है। अस्थायी रूकावट के कारण इसके लक्षण 24 घंटे से भी कम समय या कुछ मिनटों तक रहते हैं जिससे दिमाग को कोई स्थायी नुकसान नहीं होता है, इसलिए कुछ मरीज इसको नजरअंदाज करते हैं। हाँलांकि यह एक बेहद गम्भीर समस्या है जोकि बीमारी के बढ़ने की ओर इशारा करती है। इस स्ट्रोक में रूकावट थक्के के गल जाने या उसके एक स्थान से दूसरे स्थान पर चले जाने से अपनें आप ही ठीक हो जाता है।

ऐसा पाया गया है कि लगभग एक तिहाई मरीज जो इस स्ट्रोक से गुजर चुकें हैं उनमें एक साल के अंदर ही गम्भीर स्ट्रोक की समस्या बन जाती है।

स्ट्रोक के जोखिम क्या हैं?

स्ट्रोक का वैश्विक खतरा काफी अधिक है। ऐसा अनुमान लगाया गयी है कि 25 वर्ष या उससे अधिक आयु के व्यक्तियों में स्ट्रोक होने की सम्भावना 25 प्रतिशत होती है।

न बदले जा सकने वाले जोखिम:

आयु: स्ट्रोक किसी भी उम्र में हो सकता है लेकिन उम्र के बढ़ने के साथ स्ट्रोक का खतरा बढ़ता जाता है। 5 में से एक महिला और 6 में से एक पुरूष में 55 साल की उम्र के बाद स्ट्रोक होने का खतरा रहता है। भारत में स्ट्रोक के होने की सबसे कम उम्र 63 वर्ष है।

नस्ल: अफ्रीकी और एशियाई मूल के लोगों में गोरे लोगों की तुलना में स्ट्रोक का खतरा अधिक होता है। 45-54 वर्ष की आयु के अफ्रीकी लोगों में गोरे लोगों की तुलना में मौत का खतरा 3 गुना तक अधिक होता है।

लिंग: एशियाई और भारतीय मूल के पुरूषों में स्ट्रोक का खतरा महिलाओं के मुकाबले अधिक होता है। महिलाओं में स्ट्रोक आमतौर पर अधिक उम्र में होता है और उनमें स्ट्रोक से मरनें की सम्भावना भी अधिक होती है।

स्वयं या परिवार में किसी को स्ट्रोक, दिल का दौरा, ट्रान्सियेंट इस्कीमिक अटैकः परिवार के सदस्यों में या स्वयं में स्ट्रोक का इतिहास।

बदले जा सकने वाले जोखिम:

यह स्ट्रोक के होने के महत्वपूर्ण जोखिम हैं। इन जोखिमों को प्रबन्धित या नियँत्रण में रखा जा सकता है। यह इस प्रकार हैं।

जीवनशैली से जुड़े जोखिम

• शरीर का अधिक वजन या मोटा होना

• शरीर में गतिविधी का कम होना

• तम्बाकू का किसी भी रूप में सेवन जैसे कि, धूम्रपान, तम्बाकू चबाना या तम्बाकू का धुँआ लगना। यह रक्त नलिकाओं को नुकसान पहुँचाता है जिससे ब्लड प्रेशर बढ़ता है।

• शराब पीना- मुख्यत: ज्यादा या अधिक

• नसा जैसे, कोकेन इत्यादि

• हार्मोन- गर्भ निरोधक गोली का उपयोग या हार्मोन थेरेपी जैसे एस्ट्रोजेन थेरेपी, इसके खतरे को बढ़ाती है।

बीमारी या परिस्थितियाँ- इनमें वह परिस्थितियाँ शामिल हैं जिनको नियंत्रित करके स्ट्रोक के विकास को रोका जा सकता है।

• हाई बल्ड प्रेशर (हाई बीपी)- यह स्ट्रोक के लगभग 61 प्रतिशत मरीजों में पाया गया है।

• हाई कोलेस्ट्रोल

• डायबिटीज- यह स्ट्रोक के लगभग 36 प्रतिशत मरीजों में पाया गया है।

• नींद में कमी (आब्स्ट्रक्टिव स्लीप एप्नीया)

ह्रदय की बीमारीयाँ जैसे कि एट्रियल फिब्रिलेशन (दिल की अनियमित धड़कन), दिल में खराबी, दिल का दौरा, दिल में संक्रमण।

स्ट्रोक के संकेत और लक्षण क्या हैं?

Signs and symtoms of stroke

स्ट्रोक के संकेत और लक्षण तुरंत ही विकसित होते हैं जिससे दिमाग के उस हिस्से को नुकसान पहुँचता है जिससे हमारे कामकाज नियंत्रित होते हैं। यह संकेत और लक्षण इस प्रकार हैं।

1. चेहरे, हाँथ और पैरों में अचानक कमजोरी आना या उनका सुन्न पड़ जाना: इसमें चेहरे, हाँथ और पैरों में अचानक कमजोरी/लकवापन या सुन्नता आ जाती है जोकि आमतौर पर शरीर के एक तरफ होती है।

चेहरे एक तरफ टेढ़ापन आ जाता है। व्यक्ति प्रभावित हिस्से की माँशपेशियों का इस्तेमाल ठीक ढंग से नही कर पाता है।

हाँथ– दोनों हाँथों को ऊपर उठाने से प्रभावित हाँथ नीचे गिर जाता है जो माँशपेशियों में कमजोरी को दर्शाता है।

पैर की माँशपेशियों में कमजोरी के कारण व्यक्ति चलनें और खड़े होने में तथा पैर को उठाने मे असमर्थ हो जाता है। इस कारण प्रभावित जगह पर सुन्नता तथा गुदगुदी का अहसास होता है।

2. अचानक खड़े होने में और चलने में समस्या, जिस कारण चक्कर आ जाते हैं, सँतुलन बिगड़ जाता है या तालमेंल की समस्या हो जाती है।

3. अचानक भ्रम का होना

4. बोलने तथा दूसरे की बातों को समझनें में अचानक समस्या होना

5. एक या दोनों आँखों से देखने में समस्या– अचानक से एक या दोनों आँखों से देखने की क्षमता में कमी या धुँधलापन विकसित हो जाता है। कुछ लोगों में एक चीज दो दिखाई दे सकती हैं।

6. अचानक तेज सिर दर्द जिसमें उल्टी या बेहोशी हो सकती है।

स्ट्रोक को कैसे पहचाना जाये या आपातकाल में अस्पताल कब ले जाया जाये?

स्ट्रोक होने के बाद प्रत्येक मिनट महत्वपूर्ण होता है। तुरन्त इलाज से मौत या विकलांगता के खतरे को कम किया जा सकता है। यह महत्वपूर्ण है कि मरीज को जल्द से जल्द अस्पताल पहुँचाया जाये जिससे की लक्षणों के पनपने से पहले मरीज को थ्रोम्बोलायटिक इलाज दिया जा सके। लोगों में स्ट्रोक की जल्द पहचान की क्षमता को बढ़ाने के लिए कुछ विशेषतायें विकसित की गयी हैं जिसे “FAST” के नाम से जाना जाता है।

F- Face drooping (चेहरा लटकना)- व्यक्ति को मुस्कराने के लिए बोलें और देखें की चेहरा एक तरफ लटकता है या नहीं।

A- Arm weakness (हाँथो में कमजोरी)- व्यक्ति को दोनों हाँथ ऊपर उठाने के लिए बोलें और देखें की एक हाँथ नीचे की ओर तो नहीं जा रहा।

S- Speech difficulty (बोलने में परेशानी)– व्यक्ति को साधारण वाक्य बोलने के लिए कहें और देखें की उसकी आवाज में लड़खड़ाहट तो नही हैं, या वह बोल नहीं पा रहा।

T- Time to call Emergency (आपातकाल में मरीज को अस्पताल ले जाना)– यदि व्यक्ति में इनमें से कोई भी लक्षण दिखायी देते हैं, या फिर लक्षण चलें भी जाते है तो तुरन्त ही आपातकाल में संपर्क करें और मरीज को अस्पताल लें जायें।

FAST-brain-stroke

लक्षणों के दिखने का समय जरुर नोट कर लें, क्योंकि सूचना डाक्टरों को उसके अनुसार फैसले लेने में मदद करती है। यदि आसपास कोई एम्बुलेन्स मौजूद हो तो मरीज को एम्बुलेन्स में ले जायें जिससे की मरीज जल्दी अस्पताल पहुँच सके। ऐसा पाया गया है कि वह मरीज जो लक्षणों के उभरने के 3 घंटे के भीतर अस्पताल पहुँच जाते हैं उनमें 3 महीने के बाद भी विकलांगता का खतरा कम होता है, बजाय उनके जिन्हे इलाज समय पर नहीं मिलता।

स्ट्रोक की जटिलतायें क्या है?

स्ट्रोक से कभी-कभी स्थायी या अस्थायी विकलाँगता आ सकती है, और यह इस बात पर निर्भर करता है कि दिमाग में खून की आपूर्ति की कमी कितने समय तक रहती और इसका कौन सा हिस्सा प्रभावित होता है। जटिलताओं में शामिल है:

• लकवा या माँसपेशी की क्रियाकलाप में कमी. आपके शरीर के एक हिस्से में लकवा मार सकता है या आप कुछ माँशपेशियों पर नियंत्रण खो देते हैं जैसै आपके चेहरे के एक हिस्से की तरफ या एक हाँथ की तरफ।

• बोलने और निगलनें में परेशानी. स्ट्रोक आपके मुँह और गले की माँशपेशियों में नियंत्रण को प्रभावित कर सकता है, जिससे आपको बात करने, निगलनें और खानें में परेशानी हो सकती है। आपको भाषा के बोलने, समझनें, पढ़ने या लिखनें में भी परेशानी हो सकती है।

• याद्दाश्त का जाना या सोचनें में परेशानी. बहुत सारे लोग जिल्हें स्ट्रोक हुआ है उनमें याद्दाश्त जाती है। कुछ लोगों मे सोचनें, तर्क रखने, फैसले लेने और चीजों को समझनें में परेशानी होती है।

• भावनात्मक समस्यायें. वह लोग जिन्हें स्ट्रोक हुआ है उन्हें अपनी भावनओं को नियंत्रित करने में कठिनाई होती है या फिर उनमें तनाव विकसित हो सकता है।

• दर्द. शरीर के किसी हिस्से में स्ट्रोक के कारण दर्द, सुन्नता या अन्य प्रकार की संवेदनायें हो सकती हैं। उदाहरण के लिए यदि स्ट्रोक के कारण आपके बाँयें हाथ में संवेदना खत्म हो जाती है तो उसमें गुदगुदी का भावना विकसित हो सकती है।

• खुद की देखरेख और व्यवहार में बदलाव. वह लोग जिन्हें स्ट्रोक हुआ है वह आम चीजों से दूर होते चले जाते हैं। रोजमर्रा के कामों और अपने आप को संवारने में उन्हें मदद की आवश्यकता पड़ सकती है।

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