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स्ट्रेच मार्क्स (स्ट्रेडिस्टेन्सी)

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परिचय

स्ट्रेडिस्टेन्सी या स्ट्रेच मार्क्स त्वचा की आम स्थिति है, जो लंबी चिकनी या लहराती हुयी एट्रोफिक त्वचा की तरह दिखती है। ये आमतौर पर स्ट्रेचिंग से होने वाली डर्मल क्षति के कारण होती है। शरीर में अचानक हुये परिवर्तन, इलास्टिन और कोलेजन (त्वचा का सपोर्ट करता है) के टूटने का कारण बनते हैं, जिससे त्वचा फटने लगती है। ये महिलाओं में अधिक आम हैं, जोकि आमतौर पर पेट, स्तनों, नितंबों और जांघों पर देखे जाते है। इलाज द्वारा खिंचाव के निशान (स्ट्रेच मार्क्स) को कम किया जा सकता, लेकिन उन्हें पूरी तरह से हटाया नहीं जा सकता है।

कारण

इसका सही कारण विवादास्पद बना हुआ है। ऐसा माना जाता है कि खिंचाव के निशान (स्ट्रेच मार्क्स), गर्भावस्था, तेजी से वजन बढ़ने या घटने, और एड्रीनोकॉर्टिकल असामान्यता जैसी विभिन्न शारीरिक स्थितियों के कारण पड़ते हैं, क्योंकि यह लचकदार फाइबर को कमजोर करते है।

• गर्भावस्था में खिंचाव के निशान हार्मोन तथा संयोजी ऊतक (कोलेजन और इलास्टिन) पर तनाव बढ़ जाता है। के कारण होते हैं

जोखिम कारक

• गर्भावस्था

• तेजी से वजन बढ़ना

• वजन प्रशिक्षण (जिम करना) जिससे मांसपेशियों में तेजी से विकास होता है

• उच्च बीएमआई

• फिजपैट्रिक त्वचा टाइप I और IV

• खिंचाव के निशान ((स्ट्रेच मार्क्स)) का पारिवारिक इतिहास

• टाॅपिकल कोर्टिकोस्टेरॉयड या ओरल स्टेरॉयड का लंबे समय तक उपयोग, जिससे कशिंग रोग होता है।

संकेत और लक्षण

• शुरूआती चरण में स्ट्री (स्ट्रेच मार्क्स) लाल से बैंगनी लहरदार घावों के रूप में मौजूद होता हैं, इसे स्ट्रीएरुब्रा (रूब्रा जिसका अर्थ लाल) के रूप में जाना जाता है।

• बाद में लालिमा फीकी हो जाती है, और पीछे सफेद झुर्रियोंदार एट्रोफिक घाव छोड़ देती है, जिसे स्ट्री अल्बा (अल्बा का अर्थ सफेद) के रूप में जाना जाता है।

• आम जगहें:- पेट, जांघ, नितंबों, हाँथ और स्तन।

• टापिकल स्टेरॉयड के कारण स्ट्री (स्ट्रेच मार्क्स) चेहरे या शरीर के जोड़ों पर भी हो सकता है।

रोकथाम

कुछ शोधकर्ताओं के अनुसार खिंचाव के निशान (स्ट्रेच मार्क्स) को रोकना मुश्किल होता है, लेकिन कुछ अध्ययन टापिकल निवारक तरीकों का उल्लेख बताते हैं:-

1. गर्भावस्था के दौरान लगायी गयी सेंटेलासियास्टिका एक्सट्रैक्ट सहित ट्रोफोलास्टिन क्रीम से खिंचाव के निशान और इसकी गंभीरता को कम करने में मदद देखी गयी है।

2. जैतून का तेल, दिन में दो बार बिना मालिश के लगाना।

3. क्रीम जिसमें हायलुरोनिक एसिड, एलनटोइन, विटमेन ए, विटामिन और कैल्शियम पेंटोथेनेट होता है।

उपचार

यह समझना महत्वपूर्ण है कि कोई भी उपचार खिंचाव के निशान के लिए काम नहीं करता है, यह आमतौर पर उपचार का संयोजन होता है, और कई बार कुछ भी काम नहीं करता है। जो एक व्यक्ति के लिए काम आ सकता है, वह शायद दूसरों के लिए कारगर न हो। नए खिंचाव के निशान उपचार के लिए बेहतर होते हैं। यदि कोई निशान पुराना हो जाता; तो इसका इलाज मुश्किल हो जाता है।

 

सामयिक चिकित्सा

• टापिकल ट्रेटिनोइन क्रीम 0.05 % या 0.1 %

• ग्लाइकोलिक एसिड 20% + 10% एस्कोर्बिक एसिड

• हायलूरोनिक एसिड

 

गैर-इनवेसिव थेरेपी

• माइक्रो डर्माब्रेशन

• रासायनिक पील

• लेजर (LASERs)

फ्रैक्शनल लेजरनाॅन-फ्रैक्शनल लेजर
नाॅन-एब्लेटिव एरबियम: ग्लासस्ट्री अल्बा के लिए एक्सीमर (308-एनएम)
एब्लेटिव कार्बन डाइऑक्साइड (CO2)स्ट्राइएरुब्रा के लिए पल्स्ड डाय (585-एनएम)
नियोडिमियम-डॉप्ड इट्रियम एल्यूमीनियम गार्नेट (Nd:YAG)
कॉपर ब्रोमाइड

• रेडियोफ्रीक्वेंसी – द्विध्रुवी (बाइपोलर) या त्रिध्रुवीय (ट्राइपोलर) रेडियो आवृत्ति

• माइक्रोनीडलिंग- यह त्वचा पर नियंत्रित चोट के माध्यम से नए कोलेजन और इलास्टिन के उत्पादन का कारण बनता है।

• लाइट थेरेपी

– तीव्र स्पंदित प्रकाश (इंटेनस्ड पल्श्ड लाइट)

– पराबैंगनी प्रकाश (इन्फ्रारेड लाइट)- यूवी-बी और यूवी-ए का संयोजन

– इन्फ्रारेड लाइट – 800 से 1800 एनएम के परिणामस्वरूप स्ट्री अल्बा में 50 प्रतिशत तक सुधार हो सकता है।

घरेलू उपचार

• बादाम का तेल

• कोकोआ मक्खन

• जैतून का तेल

• पाल्म तेल

• शीया मक्खन

• कैमोमाइल

• सेंटेलाएशियाटिकाएक्ट्रैक्ट

• नारियल तेल

• डारूटोसाइड

• क्रोबेरी

• ग्लाइसिन सोजा

• मरीन कोलेजन

• ल्यूजिन बीज का अर्क

• लिकोरिस अर्क

यह आर्टिकल इस शोध पर आधारित है
• Farahnik B, Park K, Kroumpouzos G, Murase J. Striaegravidarum: Risk factors, prevention, and management. Int J WomensDermatol. 2016;3(2):77–85. Published 2016 Dec 6. doi:10.1016/j.ijwd.2016.11.001
• Singh G, Kumar LP. Striaedistensae. Indian J DermatolVenereolLeprol2005;71:370-2.
• Ud-Din S, McGeorge D, Bayat A. Topical management of striaedistensae (stretch marks): prevention and therapy of striaerubrae and albae. J EurAcadDermatolVenereol. 2016;30(2):211–222. doi:10.1111/jdv.13223

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