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इस्कीमिक या कोरोनरी हार्ट डीजीज

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कोरोनरी हार्ट डीजीज या इस्कीमिक हार्ट डीजीज क्या है?

Heart-blockage

कोरोनरी हार्ट डीजीज एक ऐसी बीमारी है जिसमें प्लाक नामक फैटी पदार्थ कोरोनरी आर्टरी (दिल तक खून पहुँचाने वाली नस) के अंदर जमा हो जाता है जिससे आर्टरी (धमनी) के अंदर का रास्ता पतला हो जाता है या फिर उसमें रूकावट पैदा हो जाती है।

इस्कीमिक हार्ट डीजीज एक ऐसी बीमारी है जिसमें कोरोनरी आर्टरी का रास्ता अधिक मात्रा में पतला हो जाता है, जिस कारण दिल की माँशपेशियों में खून ठीक तरह से नहीं पहुँच पाता है। इस कारण कई सारे लक्षण पैदा होते हैं या दिल का दौरा भी पड़ सकता है।

कोरोनरी हार्ट डीजीज, इस्कीमिक हार्ट डीजीज का एक कारक है। कोरोनरी हार्ट डीजीज के सारे मामलों में खून की रूकावट पैदा नहीं होती है। हाँलांकि प्लाक का जमा होना लगातार चलने वाली प्रक्रिया है जोकि अंत में नुकसान या हार्ट अटैक का कारण बनती है। इसलिए यह महत्वपूर्ण हो जाता है कि इस्कीमिक हार्ट डीजीज का इलाज सही समय पर किया जाये।

इसके लक्षण और संकेत क्या है?

इस्कीमिक हार्ट डीजीज के सबसे ज्यादा दिखने वाले लक्षण सीने का दर्द- जिसे एनजाइना कहते हैं, साँस लेने में दिक्कत और दिल का दौरा हैं। ये तब तक दिखायी नहीं देते है जब तक कि अचानक दिल का दौरा नहीं पड़ता है जिसे साईलेंट हार्ट अटैक कहा जाता है।

• एनजाइना (सीने का दर्द): आमतौर पर इसमें व्यक्ति सीने के बीच में या बाँयी ओर दबाव, खिँचाव या सिकुड़न जैसा दर्द महसूस करता है। दर्द बाँये हाँथ, कन्धा, रीढ़, गर्दन या जबड़े में भी हो सकता है। दर्द बदहजमी और जलन जैसा महसूस हो सकता है। दर्द मानसिक और शारीरिक तनाव के रूप शुरू होता है और कुछ आराम करने बाद अपने आप ही चला जाता है।

• दिल का दौरा: आमतौर इसमें व्यक्ति के सीने, कँधे और हाँथ में गंभीर दबाव जैसा दर्द होता है, जोकि आमतौर पर आराम करते समय होता है और अपने आप नहीं जाता है।

• साँस लेने में तकलीफ: यह आमतौर पर काम करने के दौरान होती है। इसमें दिल खून को सही तरीके से पंप नहीं करता है जिससे साँस लेने में तकलीफ होती है।

अन्य दूसरे संकेत और लक्षण जो हो सकते हैं वह इस प्रकार हैं:

• गर्दन में दर्द।

• अचानक तेज पसीना।

• जी मिचलाना।

• चक्कर आना।

• थकावट।

• बेचैन और चिंतित महसूस करना।

महिलाओं में लक्षण: महिलाओं में लक्षण अन्य बीमारियों के लक्षण जैसे प्रतीत हो सकते है, जैसे गर्दन, जबड़े और पेट में दर्द, जी मिचलाना, उल्टी, थकावट या चक्कर आना।

इसकी जटिलताएं क्या है?

इस्कीमिक हार्ट डीजीज जो खुद ही कोरोनरी हार्ट डीजीज के कारण होने वाली समस्या है, आगे चलकर गंभीर जटिलताएं पैदा कर सकती है।

1. अक्यूट कोरोनरी सिंड्रोम: यह समस्या प्लाक के बिगड़ने के कारण होती है, जिस कारण कोरोनरी आर्टरी (धमनी) में रूकावट पैदा हो जाती है। यह एक जानलेवा समस्या है जिसमें तुरंत इलाज की आवश्यकता होती है। रूकावट की जगह और समय तथा नुकसान के आधार पर इससे तीन जटिलताएं हो सकती हैं।

• अस्थिर एनजाइना: यह एनजाइना काफी गंभीर होता है, जोकि बारबार या आराम के वक्त होता है और लम्बे समय तक रहता है। इससे दिल का दौरा पड़ सकता है, जिसके इलाज के लिए एक प्रक्रिया की आवश्यकता पड़ती है।

• नान एसटी सेगमेंट इलेवेशन मायोकार्डियल इनफार्कशन (NSTEMI ): इस तरह के दिल के दौरे में ईसीजी (ECG) में कोई बदलाव दिखायी नहीं देते हैं। हाँलांकि जब कार्डिएक मार्कर के लिए खून की जाँच की जाती है, तब दिल में होने वाले नुकसान का पता चलता है। कोरोनरी आर्टरी (धमनी) में अस्थायी और हल्की रूकावट के कारण दिल के नुकसान की सीमा कम होती है।

• एसटी सेगमेंट इलेवेशन मायोकार्डियल इनफार्कशन (STEMI): इस तरह के दिल के दौरे में कार्डिएक मार्कर के लिए ईसीजी (ECG) और खून की जाँच दोनो में बदलाव दिखायी देते हैं। इसमें नुकसान अचानक और लंबे समय के लिए होता है, इस तरह यह दिल की माँशपेशियों के बड़े हिस्से को प्रभावित करता है।

2. सॅडन कार्डिएक अरेस्ट (SCA): इस्कीमिक हार्ट डीजीज को सॅडन कार्डिएक अरेस्ट का कारक माना जाता है, जहाँ पर दिल  पूरी तरह से काम करना बंद कर देता है जिस कारण मौत हो जाती है। यह दिल के दौरे से अलग होता है, जिसमें दिल अचानक काम करना बंद नहीं करता और केवल एक हिस्से में ही खराबी आती है। जबकि सॅडन कार्डिएक अरेस्ट (SCA) में सम्पूर्ण दिल काम करना बंद कर देता है।

3. हार्ट फेल्योर: लंबे समय से खून की रूकावट या दिल का दौरा, दिल के एक हिस्से को नुकसान पहुँचा सकता है जिससे दिल कमजोर हो जाता है। इससे दिल की खून को पंप करने की क्षमता कम हो जाती है जिसे हार्ट फेल्योर कहा जाता है।

4. कार्डियोजेनिक शॅाक: दिल का दौरा कार्डियोजेनिक शॅाक का सबसे सामान्य कारक है। हार्ट फेल्योर से भी कार्डियोजेनिक शॅाक हो सकता है।

5. अरिदमिया (दिल की आसामान्य लय): दिल में खून की कमी या उसके किसी हिस्से को नुकसान दिल की विधुतीय तरंगो (इलेक्ट्रिकल इम्पल्सेस) को फैलाने की क्षमता को प्रभावित कर सकता हैं, जिसके कारण दिल की लय में आसामान्यता आ जाती है।

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कोरोनरी आर्टरी डीजीज या इस्कीमिक हार्ट डीजीज किस कारण होती है?

कोरोनरी आर्टरी (धमनी) खून की नलियाँ होती है जोकि आक्सीजन युक्त खून को दिल तक पहुँचाती है, जिसके कारण दिल ठीक से काम कर पाता है। ये नलियाँ दिल और शरीर से जूड़ी होती हैं जोकि खून को शरीर के दूसरे हिस्से में पहुँचाती है।

• कोरोनरी हार्ट डीजीज तब होती है जब कोरोनरी धमनियों के अदर प्लाक नामक फैटी पदार्थ जमा हो जाता है जिस कारण कोरोनरी आर्टरी (धमनी) कें अंदर का रास्ता पतला हो जाता है।

• इस्कीमिक हार्ट डीजीज तब होती है जब कोरोनरी आर्टरी (धमनी) के अंदर का रास्ता अधिक मात्रा में पतला हो जाता है, इस कारण दिल की माँशपेशियों में खून ठीक से नहीं पहुँच पाता है, परिणामस्वरूप ऊपर दिये गये लक्षण पैदा हो जाते हैं।

कोरोनरी आर्टरी (धमनी) के रास्ते का पतलापन, खून की नलियों में प्लाक या थक्के के जमने से, या कोरोनरी आर्टरी (धमनी) में ऐंठन के कारण होता है।

• प्लाक: जैसे-जैसे व्यक्ति को उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे कोरोनरी आर्टरी में फैट (चर्बी) का जमना बढ़ता चला जाता है। इससे खून में मौजूद दूसरे तत्व जैसे इन्फ्लामेट्री कोशिकायें और कैल्शियम, फैट के साथ मिलकर प्लाक का निर्माण करते है। ये प्लाक आकार, मोटाई और जगह के आधार पर आर्टरी में गंभीर या सामान्य लक्षण पैदा करते हैं। प्लाक के कारण धमनी में होने वाली 50 प्रतिशत सिकुड़न को गंभीर माना जाता है।

• खून का थक्का: कभी-कभी प्लाक टूट भी जाते हैं जिससे धमनी के अंदर की सतह दिखने लगती है। इससे प्लैटिलेट्स (खून की कोशिकायें जोकि थक्के के जमने में भूमिका निभाती है) उस सतह पर आकर जमा हो जाते हैं, जिससे उस जगह पर थक्का बन जाता है। थक्का आर्टरी के अंदर थोड़ा या कई बार पूरा सिकुड़न पैदा कर सकता है जिससे खून का बहाव पूरी तरह से रूक सकता है।

• धमनी में ऐंठन: एंडोथेलियल चोट, प्लाक के बनने और प्लाक के टूटने के दौरान होने वाली सूजन आर्टरी की माँशपेशियों में बदलाव ला सकती है। ये आर्टरी तनाव या शारीरिक क्रिया के दौरान खून की आपूर्ति ठीक ढंग से नहीं कर पाती हैं। इस दौरान ये ठीक से फैल या सिकुड़ नहीं पाती हैं, जिससे खून का दौड़ान और कम हो जाता है।

इस बीमारी के विकसित होने के जोखिम कारक क्या है?

ऐसे बहुत सारे कारक हैं जो व्यक्ति में कोरोनरी आर्टरी डीजीज के विकसित होने में सहायक होते हैं। इन कारकों को नियंत्रण और इलाज के आधार पर मोडिफाईबल और नान-मोडिफाईबल कारकों में बाँटा जा सकता है।

 

बदले जा सकने वाले कारक (मोडिफाईबल फैक्टर)

ये वो कारक हैं जो जीवनकाल के दौरान विकसित होते हैं, और जिनका इलाज या जिनपर नियंत्रण किया जा सकता है।

• धूम्रपान (स्मोकिंग): तम्बाकू का किसी भी रूप में प्रयोग जैसे सिगरेट, बीड़ी, सिगार या दूसरे के धूम्रपान से होने वाले धुयें का अंदर जाना, धमनीं में प्लाक के बनने का कारण बन सकता है।

• वायु प्रदूषण: के कारण प्लाक और उच्च रक्त चाप (हाई बीपी) की स्थिति बन सकती है। जिसके कारण इस्कीमिक हार्ट डीजीज विकसित हो सकती है। यह मुख्य रूप से महिलाओं, बूढ़ों, मोटे और डायबीटीज से ग्रसित लोगों को प्रभावित करता है।

• मानसिक तनाव: मानसिक तनाव सीधे रूप से कोरोनरी आर्टरी में सिकुड़न पैदा कर सकता है जिससे खून का बहाव कम हो जाता है। इसके अलावा यह व्यक्ति में धूम्रपान (स्मोकिंग) या अधिक खाना (सुगर और फैट युक्त) खाने की आदत पैदा कर सकता है। इससे व्यक्ति में उच्च रक्त चाप (हाई बीपी) की बीमारी भी हो सकती है।

• गलत खान-पान: अधिक फैट, सुगर और नमक मिले खाने का सेवन प्लाक के निर्माण में सहायक होता है, जिससे दूसरी बीमारियों के होने का खतरा बढ़ जाता है जैसे, हाई ब्लड कोलेस्ट्रोल और ट्राईग्लिसराईड्स लेवल, तथा उच्च रक्त चाप (हाई बीपी)।

• शारीरिक क्रियाओं की कमी: यह दूसरी परेशानियाँ होने का खतरा बढ़ाती है जैसे, बढ़ा हुआ वजन, मानसिक तनाव से निपटने की क्षमता में कमीं, बढ़ा हुआ कोलेस्ट्रोल और ट्राईग्लिसराइड्स लेवल इत्यादि।

• बढ़ा हुआ वजन: 25 kg/m2 बाडी मास इंडेक्स (BMI) के साथ मोटापा और अधिक वजन, को दूसरी अन्य परेशानियो से मुख्य रूप से जुड़ा पाया गया है।

• उच्च ब्लड कोलेस्ट्रोल और ट्राईग्लिसराइड्स लेवल: ये बहुत महत्वपूर्ण कारक हैं, मुख्य रूप से हाई बैड कोलेस्ट्रोल (LDL) (100mg/Dl से ऊपर), और लो गुड कोलेस्ट्रोल (HDL) (40mg/dL के अंदर)।

• हाई बीपी (ब्लड प्रेशर): अधिक दिन तक रहने वाला हाई बीपी, धमनियों में सिकुड़न और सख्ती पैदा कर सकता है।

• डायबीटीज: अनियंत्रित डायबीटीज (7.0 से अधिक HbA1c) को महत्वपूर्ण कारक माना गया है।

• क्रोनिक किडनी डीजीज: यह हाई बीपी के खतरे से जुड़ा होता है।

 

न बदले जा सकने वाले कारक (नॅान-मोडिफाईबल या इनबोर्न फैक्टर)

• उम्र: बढ़ती उम्र के साथ नसों में प्लाक के बनने का खतरा बढ़ जाता है। यह मुख्य रूप से उन लोगों में पाया जाता है जिनमें आनुवांशिक लक्षण और खराब जीवनशैली होती है। 40 साल से अधिक उम्र के पुरुषों और 50 साल से अधिक उम्र की महिलाओं में कोरोनरी आर्टरी डीजीज (CAD) का खतरा अधिक होता है।

• लिंग: पुरुषों में, महिलाओं के मुकाबले कोरोनरी आर्टरी डीजीज (CAD) का खतरा अधिक होता है। महिलाओं में महावारी बंद होने के बाद इसका खतरा बराबर बना रहता है। महिलाओं में कोरोनरी आर्टरी डीजीज के होने का खतरा तब अधिक होता है, जब वे एंडोमेट्रियोसिस (endometriosis), पीसीओस (PCOS), गर्भावस्था के दौरान होने वाली डायबीटीज या प्री-इक्लेम्पसिया से पीड़ित होती हैं।

• परिवार के स्वास्थ्य का इतिहास: यदि परिवार के किसी सदस्य को कोरोनरी आर्टरी डीजीज (CAD) है, तो व्यक्ति में इसके होने का खतरा बढ़ जाता है।

•नस्ल (Race): सभी नस्ल के लोगों में इसका खतरा बराबर होता है।

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भारत में कोरोनरी आर्टरी डीजीज कितनी आम है?

ऐसा अनुमान है कि भारत में लगभग 3 करोड़ से अधिक लोग कोरोनरी आर्टरी डीजीज से पीड़ित हैं। शहर को लोगों में यह बीमारी बहुत आम है जहाँ पर ऐसा कहा जाता है, कि 10 में 1 व्यक्ति इससे प्रभावित है। कोरोनरी आर्टरी डीजीज (CAD) के कारण होने वाली मौतों में भी इजाफा हुआ है। ऐसा अनुमान लगाया जाता है कि कोरोनरी आर्टरी डीजीज (CAD) के मरीजों में 23 प्रतिशत और वयस्कों में 32 प्रतिशत मौतें इस कारण होती है।

कोरोनरी आर्टरी डीजीज का पता कैसे करें?

कोरोनरी हार्ट डीजीज या इस्कीमिक हार्ट डीजीज के होने का अनुमान निम्नलिखित माध्यम से किया जा सकता है।

1. स्वास्थ्य का इतिहास: इसमें निम्न चीजें शामिल हैं।

• क्लीनिकल इतिहास- लक्षणों और समस्याओं से संबंधित जानकारी।

• व्यक्तिगत इतिहास- काम का प्रकार, तनाव का स्तर, शरीरिक क्रियाकलाप की जानकारी।

• पारिवारिक इतिहास- परिवार के उन सदस्यों के बारे में जानकारी लेना जिनको दिल की बीमारी, कोरोनरी आर्टरी डीजीज या उससे जुड़े खतरों की समस्या है।

2. बीपी और ह्रदय गति का आंकलन: 140/90mmHg से अधिक बीपी को बढ़ा हुआ माना जाता है।

3. बाडी मास इंडेक्स (BMI) की गणना: यह देखने के लिए की क्या आपका वजन (BMI 25–29 kg/m2) अधिक है या आप मोटापे (BMI more than 30 kg/m2) से ग्रसित हैं, जोकि कोरोनरी आर्टरी डीजीज का खतरा बढाते हैं।

4. खून की जाँचे: ये जाँचे बढ़े हुये कोलेस्ट्रोल और ट्राईग्लिसराइड्स लेवल तथा डायबीटीज का पता लगाने के लिए की जाती हैं।

अगले 10 साल के दौरान दिल के दौरे और इस्कीमिक हार्ट डीजीज (IHD) से होने वाली मौत की संभावना का पता लगाने के लिए कुछ उपयोगी साधन उपलब्ध हैं।

खतरों की गणना के लिए Atherosclerotic Cardiovascular Disease Estimator पर क्लिक करें।

• भारी जोखिम: इसमें 10 साल के भीतर दिल को दौरा पड़ने का खतरा या इस्कीमिक हार्ट डीजीज (IHD) से मरने का खतरा 20 प्रतिशत से अधिक होता है।

• मध्यम जोखिम: इसमें 10 साल के भीतर दिल को दौरा पड़ने का खतरा या इस्कीमिक हार्ट डीजीज (IHD) से मरने का खतरा 10 से 20 प्रतिशत तक होता है।

• कम जोखिम: इसमें 10 साल के भीतर दिल को दौरा पड़ने का खतरा या इस्कीमिक हार्ट डीजीज (IHD) से मरने का खतरा 10 प्रतिशत से कम होता है।

इसके उपयोग से लोग खतरे का आँकलन कर सकते हैं, और मोडिफाईबल कारको पर काम करकेआगे आने वाले खतरों को रोक सकते हैं।

20 साल से ऊपर के लोगों को जिनको इस्कीमिक हार्ट डीजीज (IHD) या कोरोनरी आर्टरी डीजीज (CAD) की समस्या नहीं है, उन्हें अपने आपको प्रत्येक 4 से 5 साल में चेक कराना चाहिये। इस्कीमिक हार्ट डीजीज (IHD) या कोरोनरी आर्टरी डीजीज (CAD) से ग्रसित लोगों को डाक्टर द्वारा बतायी गयी सलाह का नियमित पालन करना चाहिये।

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कोरोनरी या इस्कीमिक हार्ट डीजीज की रोकथाम कैसे करें?

ऐसा पाया गया है कि मोडिफाईबल कारक कोरोनरी हार्ट डीजीज के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये कारक यदि अच्छी जीवनशैली अपनाकर रोके जायें तो क्रोनिक हार्ट डीजीज (CHD) का इलाज और रोकथाम किया जा सकता है।

ये इस प्रकार  हैं:

1. अच्छा खानपान- जैसे फैट, नमक और शुगर का सेवन कम करें। फल, सलाद व फाईबर युक्त भोजन के सेवन से कोलेस्ट्रोल लेवल को ठीक रखनें में मदद मिलती है।

2. शरीरिक रूप से एक्टिव रहना व्यायाम करना: यह कार्डियोवस्क्युलर फंक्शनिंग को बनाये रखने में मदद करता है और दूसरे खतरों जैसे ज्यादा वजन, तनाव आदि को बढ़ने से रोकता है।

3. सही इलाज के द्वारा बढ़े हुये कोलेस्ट्रोल, बढ़े हुये बीपी और ब्लड शुगर लेवल पर नियंत्रण रखना।

4. धूम्रपान छोड़ना।

5. तनाव से दूर रहना।

6. सही वजन बनाये रखना।

कोरोनरी आर्टरी डीजीज की स्क्रीनिंग कैसे की जाती है?

कोरोनरी आर्टरी डीजीज (CAD)/ इस्कीमिक हार्ट डीजीज (IHD) की पहचान निम्म तरीके से की जाती है।

1. बीमारी की जानकारी: डाक्टर आपसे लक्षणों, व्यक्तिगत और पारिवारिक स्वास्थ्य जानकारी के बारे में पूँछेगे, जहाँ पर ध्यान हमेशा खतरों की मौजूदगी पर रहता है।

2. क्लिनिकल परिक्षण: डाक्टर बीपी और हार्ट रेट लेते है, तथा दिल और शरीर का परिक्षण करते है। कुछ अलग लक्षणों और खतरों के दिखने पर या कुछ जाँचे पासिटिव (positive) आने पर, डाक्टर कुछ विशेष जाँचों को करने के लिए कह सकते है। ये जाँचें इस प्रकार हैं:

3. खून की जाँच: ये जाँचे खून में कोलेस्ट्रोल, ट्राईग्लिसराइड्स, एलडीएल, एचडीएल और ग्लुकोज की मात्रा को जानने के लिए जाती हैं। कुछ कार्डिएक मार्कर जैसे सीटीएन (कार्डियक ट्रोपोनिन) और सीके-एमबी (क्रिएटिन किनसे एमबी) किये जाते हैं।

4. इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी): यह दिल में विधुतीय गतीविधि का आंकलन करके दिल के बुनियादी कामकाज को समझने में मदद करता है। यह पिछले दिल के दौरे का या हो रहे दिल के दौरे का सबूत दे सकता है।

इमेंजिंग जाँचे:

इकोकार्डियोग्राफी (ECHO): यह अल्ट्रासाउंड की तरह काम करता है। यह दिल के विभिन्न भागों और उनके कामकाज, जैसे वाल्स, चैंबर्स, वाल्व, और बड़ी नसों को दिखाता है। यह खून के पंप होने को भी दिखाता है, और दिल की खून को पंप करने की क्षमता को भी नाँपता है। यह ये भी दिखाता है कि खून की पम्पिंग में सभी भाग ठीक से काम कर रहे हैं या नहीं। यह दिखाता है कि कोई हिस्सा कम चल रहा है या बिल्कुल नहीं चल रहा है। यह हार्ट अटैक के कारण दिल के नुकसान का या खून के कम बहाव का संकेत भी देता है।

स्ट्रेस टेस्ट: यह स्ट्रेस के दौरान दिल के काम करने की क्षमता की जाँच करता है। व्यक्ति को स्ट्रेस, ट्रडमिल पर दौड़ने और साईकिल चलाने से दिया जा सकता है। यदि व्यक्ति शारीरिक कामकाज करने के काबिल नहीं होता है तो उसे स्ट्रेस दवाई द्वारा दिया जाता है। स्ट्रेस देने के दौरान या बाद में दिल की क्षमता को जाँचने के लिए इलेक्ट्रोकार्डियोग्राम (ईसीजी) और इकोकार्डियोग्राफी (ECHO) किया जा सकता है। यह दिल की उन समस्याओं का उजागर कर सकता है जो आराम के दौरान दिखायी नहीं देती हैं। कभी-कभी दवाई के उपयोग से स्ट्रेस देकर एमआरआई (MRI) भी की जा सकती है।

• सीटी एंजियोग्राफी और कैल्शियम स्कोरिंग: दोनों जाँचें कोरोनरी धमनी की इमेज (फोटो) लेने के लिए सीटी मशीन द्वारा छोड़ी गयी एक्स-रे का इस्तेमाल करती हैं। सीटी कैल्शियम स्कोरिंग कोरोनरी धमनी में कैल्शियम की मात्रा का आंकलन करती हैं, जिससे कोरोनरी आर्टरी डीजीज के खतरे का पता चलता है। सीटी एंजियोग्राफी में डाई का इस्तेमाल होता है, जोकि कोरोनरी आर्टरी को भर देती है, जिससे धमनियाँ साफ दिखायी पड़ती हैं। यह सिकुड़न/ रूकावट की मात्रा, रूकावट की जगह और रूकावट के प्रकार को दिखाता है। यह जाँच पारंपरिक कैथेटर एंजियोग्राफी की तुलना में कम जटिल होती है।

• कार्डिएक एमआरआई (MRI): यह जाँच खून के बहाव के साथ दिल तथा कोरोनरी धमनी में किसी भी दिक्कत का अनुमान लगा सकती है। जब दूसरी जाँचे विफल हो जाती हैं, तब यह जाँच कठिन मामलों का पता लगाने में मदद कर सकती है।

• कार्डिएक पीईटी (PET): इस जाँच में शरीर के अंदर एक तरल पदार्थ डाला जाता है, जोकि रेडियेशन छोड़ता है। ये रेडियेशन पीईटी (PET) मशीन द्वारा पकड़े जाते हैं जोकि दिल की इमेज (फोटो) बनाते हैं। यह दिल के विभिन्न भागों में खून के बहाव की कमी को दिखाते हैं, जिससे कोरोनरी आर्टरी डीजीज (CAD) की पहचान होती है। यह दिल के खराब हिस्सो को भी देख सकता है। यह जाँच भी स्ट्रेस या आराम के दौरान की जाती है।

• कन्वेन्सनल (पारंपरिक) कोरोनरी एंजियोग्राफी: यह जाँच कोरोनरी धमनियों, सिकुड़न और रूकावट की मात्रा और रूकावट की जगह को दिखाती है। इस जाँच का दूसरा पहलू यह है कि इसमें एक विशेष प्रकार की नली का इस्तेमाल किया जाता है, जिसे कैथेटर कहते हैं, जिसको शरीर के अंदर डालकर कोरोनरी धमनी तक पहुँचाया जाता है। हाँलांकि, इसका एक विशेष फायदा यह है कि, एन्जियोप्लास्टी और स्टेंटिंग द्वारा कोरोनरी धमनी की सिकुड़न का इलाज इसी प्रक्रिया से किया जा सकता है। यह एक व्यापक रूप से इस्तेमाल होने वाली प्रक्रिया है जोकि इमरजेंसी (आपातकाल) के मरीजों या दिल के दोरे के मरीजों में की जाती है।

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