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हेपेटाइटिस

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हेपेटाइटिस क्या है?

हेपेटाइटिस एक ऐसी स्थिति है जहां लिवर की कोशिकाओं में सूजन आ जाती है। हेपेटाइटिस में ‘हेपैट’ शब्द का मतलब लिवर होता है, तथा ‘आयटिस’ का मतलब सूजन होता है।

हेपेटाइटिस में सूजन संक्रमण, शराब, दवाओं, विषाक्त पदार्थों या एंटीबॉडी के कारण हो सकती है। हेपेटाइटिस वायरस के कारण होने वाला लिवर का संक्रमण दुनिया और भारत में हेपेटाइटिस का सबसे आम कारण है। यह हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई, में से किसी के भी कारण हो सकता है।

हेपेटाइटिस को अवधि के आधार पर दो प्रकार में विभाजित किया जा सकता है।

अक्यूट हेपेटाइटिस: इसमें लिवर में सूजन अचानक शुरू होती है, और आमतौर पर केवल कुछ हफ्तों के लिए 6 महीने से कम अवधि तक रहती है। प्रभावित व्यक्ति में गंभीर लक्षण पैदा हो सकते हैं, और कोई भी लक्षण नहीं हो सकते हैं। अक्यूट हेपेटाइटिस के अधिकांश मामले अपने आप ठीक हो जाते हैं। हालांकि कुछ मामले लंबी अवधि तक बने रहते हैं, और अक्यूट हेपेटाइटिस का कारण बनते हैं।

क्रोनिक हेपेटाइटिस: इसमें लिवर की सूजन कम से कम 6 महीने तक रहती है। यह हेपेटाइटिस बी और सी वायरस, नैश, अल्कोहल आदि के कारण हो सकता है। क्रोनिक हेपेटाइटिस के अधिकांश मामले हेपेटाइटिस सी, के होते हैं, जोकि लगभग 60 से 70 प्रतिशत हैं। क्रोनिक हेपेटाइटिस से पीड़ित अधिकांश लोगों में कोई लक्षण नहीं होते हैं। लेकिन कुछ लोगों में विशिष्ट लक्षण होते हैं, जैसे थकान, भूख की कमी और बीमारी की सामान्य भावना। क्रोनिक हेपेटाइटिस में फाइब्रोसिस विकसित होने की संभावना अधिक होती है, जोकि सिरोसिस और लिवर फेल्योर या लिवर कैंसर में बदल सकती है।

हेपेटाइटिस कितना आम हैं?

पूरी दुनिया में लगभग 40 करोड़ लोग क्रोनिक हेपेटाइटिस से पीड़ित हैं, और एशिया-पैसेफिक क्षेत्र को इस महामारी का केन्द्र माना जाता है।

हेपेटाइटिस के कारण क्या हैं?

हेपेटाइटिस, किसी संक्रमण या पदार्थ के कारण हो सकता है, जोकि लिवर कोशिकाओं को नुकसान और सूजन का कारण बन सकता है।

कारणों को मोटे तौर पर दो में वर्गीकृत किया जा सकता है:

 

संक्रामक कारण (वायरल हेपेटाइटिस)

ये हेपेटाइटिस का सबसे आम कारण हैं। इससे अक्यूट और क्रोनिक हेपेटाइटिस दोनों हो सकते हैं। नीचे अक्यूट वायरल हेपेटाइटिस के कारण दिये गये हैं:

• हेपेटाइटिस ए वायरस (एचएवी): यह संक्रमण, हेपेटाइटिस ए वायरस से संक्रमित व्यक्ति के मल से दूषित भोजन या पेय के सेवन के कारण होता है। यह खराब स्वच्छता और स्वच्छता से संबंधित बुरी आदतों से संबंधित होता है। भारत में यह आमतौर पर बच्चों में अधिक देखा जाता है। एक अध्ययन से पता चला है कि, जो बच्चे शौच के लिए निजी शौचालयों का इस्तेमाल करते हैं, उनमें यह कम होता है, बजाय उनके शौच के लिए खुली जगहों पर जाते हैं।

• हेपेटाइटिस बी वायरस (एचबीवी): यह संक्रमण हेपेटाइटिस बी वायरस से संक्रमित व्यक्ति के खून और शरीर के तरल पदार्थ के संपर्क में आने से फैलता है। यह खनू चढ़ाने, दवाओं के इंजेक्शन लगाने, असुरक्षित यौन संबंध या गर्भावस्था के दौरान मां से बच्चों में हो सकता है। भारत में करीब 4 करोड़ लोगों को एचबीवी होने का अनुमान है। एचबीवी से ग्रसित 3 लोगों में से करीब 2 लोगों को  खुद के संक्रमण की जानकारी नहीं होती है। यह अनुमान है कि, इस वायरस से ग्रसित करीब 15 से 25 प्रतिशत लोगों में सिरोसिस या लिवर कैंसर विकसित होने की, और समय से पहले मौत की संभावना होती है। यह लीवर कैंसर का एक प्रमुख कारण है।

• हेपेटाइटिस सी वायरस (एचसीवी): यह संक्रमण, संक्रमित व्यक्ति के शरीर के तरल पदार्थ के सीधे संपर्क में आने से फैलता है,  जैसे इंजेक्शन द्वारा नशीली दवाओं के दुरुपयोग और असुरक्षित यौन संपर्क से। हेपेटाइटिस सी से ग्रसित करीब 50 प्रतिशत लोगों को खुद के संक्रमण की जानकारी नहीं होती है।

• हेपेटाइटिस डी वायरस (एचडीवी): यह संक्रमण, संक्रमित खून के सीधे संपर्क में आने से फैलता है। हेपेटाइटिस डी एक दुर्लभ प्रकार का हेपेटाइटिस है, जो केवल हेपेटाइटिस बी संक्रमण के साथ होता है, जिसके परिणाम स्वरूप स्थिति और गंभीर हो सकती है।

• हेपेटाइटिस ई वायरस (एचईवी): यह संक्रमण एचईवी से संक्रमित व्यक्ति के मल से दूषित पानी के सेवन से होता है। यह गंदगी वाले क्षेत्रों में देखा जाता है, और भारत में यह महावारी का एकवआम कारण है ।

कुछ बैक्टीरिया भी, कभी-कभी हेपेटाइटिस का कारण बन सकते हैं, जैसे एनाप्लाज्मा, नोकार्डिया आदि।

 

गैर संक्रामक कारण

ये कारण कम आम हैं

• शराब: अत्यधिक शराब पीने से अल्कोहलिक स्टीटोहेपेटाइटिस (ऐश) होता है, जो आगे चलकर सिरोसिस के विकास को और बढ़ा सकता है।

• नैश (NASH)

• ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस

• दवाएं: पैरासिटामोल, एमोक्सीसिलिन, एंटीट्युबरक्युलोसिस दवाएं, मिनोसाइक्लिन और कई अन्य

• इस्कीमिक हेपेटाइटिस

• विल्सन डीजीज

• गर्भावस्था

अधिक जानें …

क्रोनिक हेपेटाइटिस के कारण क्या हैं?

कुछ तरह के संक्रमण, विषाक्त पदार्थ या दवाओं से, लगातार लंबे समय तक चलने वाली लिवर की सूजन हो सकती है, जिससे क्रोनिक हेपेटाइटिस का विकास हो सकता है।

क्रोनिक हेपेटाइटिस के कारण:

• हेपेटाइटिस सी वायरस: यह वायरस क्रोनिक हेपेटाइटिस के 60 से 70 प्रतिशत मामलों पाया जाता है। अक्यूट हेपेटाइटिस सी के लगभग 75 से 85 प्रतिशत मामले क्रोनिक हेपेटाइटिस में बदल जाते हैं। हेपेटाइटिस सी लिवर प्रत्यारोपण और लिवर कैंसर का एक प्रमुख कारण है।

• हेपेटाइटिस बी वायरस:  इस वायरस से संक्रमित लगभग 5 से 10 प्रतिशत लोगों में क्रोनिक हेपेटाइटिस का विकास होता है। यह शिशुओं में सबसे अधिक (90 प्रतिशत) और वयस्को में सबसे कम (5 प्रतिशत) होता है।

• नैश (नॉनअल्कोहलिक स्टीटोहेपेटाइटिस)

• शराब से संबंधित लिवर की बीमारी

• ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस

एक्यूट हेपेटाइटिस के लक्षण और संकेत क्या हैं?

हेपेटाइटिस जब एक्यूट रूप में होता है, तो इसमें लक्षण या तो गंभीर होते हैं या फिर कोई भी लक्षण नहीं होते है। जब व्यक्ति में लक्षण विकसित होते है, तो यह अचानक होते है, जिनसे मामूली बुखार या लिवर काम कना बंद कर देता है।

एक्यूट हेपेटाइटिस के लक्षण:

• फ्लू जैसे लक्षण- बुखार, शरीर में दर्द होना आदि

• बीमार होने की सामान्य भावना (अस्वस्थता)

• भूख न लगना

• जी मिचलाना और उल्टी होना

• कमजोरी और थकान होना

• ऊपरी दाईं ओर पेट में दर्द होना, जहां लिवर स्थित होता है

• पीलिया- आंखों की त्वचा और सफेदी का रंग पीला हो जाना, जो खुजली के साथ हो सकता है।

• गहरे रंग का पेशाब आना

• पीला रंग का मल आना

हेपेटाइटिस में पीलिया क्यों होता है? हेपेटाइटिस में मल और मूत्र के रंग में परिवर्तन क्यों होता है?

पीलिया, क्षतिग्रस्त लिवर द्वारा खून से बिलीरुबिन को बाहर न निकाल पाने के कारण होता है। इससे बिलीरूबिन त्वचा और आंखों में जमा हो जाता है, जिसके कारण इनका रंग पीला पड़ जाता है। अतिरिक्त बिलीरुबिन पेशाब के माध्यम से बाहर निकलता है, जो मूत्र को गहरा रंग देता है। इससे बिलिरूबिन आँतों में उत्सर्जित नहीं हो पाता है, जोकि वह आमतौर पर करता है, जिससे बिलिरूबिन का रंग भूरा और पीला पड़ जाता है।

एक्यूट हेपेटाइटिस के स्वाभाविक कोर्स क्या है?

ज्यादातर शूरुआती लक्षण जैसे बुखार, भूख की कमी, जी मिचलाना, उल्टी आदि, आमतौर पर एक सप्ताह के भीतर, कम या खत्म हो जाते हैं। इससे प्रभावित व्यक्ति बेहतर महसूस करने लगता है, फिर चाहें पीलिया बिगड़ क्यों न जाये। पीलिया आमतौर पर 1 से 2 सप्ताह में काफी बढ़ता है, और 2 से 4 सप्ताह में में धीरे-धीरे खत्म हो जाता है। हालांकि, कभी-कभी यह लंबे समय तक चल सकता है।

लक्षणों की गंभीरता और ठीक होने का समय लोगों में अलग-अलग होता है। यह कारण (वायरस का प्रकार या टोक्सिन) और व्यक्ति के शरीर की प्रतिक्रिया पर निर्भर करता है। हेपेटाइटिस ए और सी से आमतौर पर मामूली लक्षण या कोई लक्षण दिखायी नहीं देते हैं। हेपेटाइटिस बी और ई में अधिकतर गंभीर लक्षण पैदा होते हैं। हेपेटाइटिस बी और डी दोनों के साथ संक्रमण आमतौर पर गंभीर होता है, जो फुलमिनेंट हेपेटाइटिस में बदल सकता है।

इसमें आमतौर पर लोग 4 से 8 सप्ताह में ठीक हो जाते हैं। उन्हें आम तौर पर केवल लक्षण के उपचार की आवश्यकता होती है, या किसी भी उपचार की जरूरत नहीं पड़ती है।

हेपेटाइटिस वायरस से संक्रमित लोगों में से कुछ लोग पूरी तरह से ठीक हो जाते हैं, या उनमें कोई महत्वपूर्ण लक्षण दिखायी नहीं देते है, लेकिन उनमें वायरस अभी भी मौजूद होता है। इन लोगों को वाहक (carrier) कहा जाता है और आखिर में उनमें क्रोनिक हेपेटाइटिस विकसित हो जाता है। यह लोग दूसरों में संक्रमण फैलाने के लिए वाहक का काम करते हैं।

फुलमिनेंट हेपेटाइटिस क्या है और फुलमिनेंट हेपेटाइटिस के संकेत क्या हैं?

दुर्लभ मामलों में हेपेटाइटिस तेजी से फुलमिनेंट हेपेटाइटिस नामक गंभीर बीमारी में विकसित हो सकता है। इससे लिवर का ज्यादातर हिस्सा क्षतिग्रस्त हो जाता है। जिसके कारण लिवर का फेल हो जाना, और हेपेटिक एंसेफेलोपैथी, कॉस्गुलोपैथी और किडनी का फेल हो जाने जैसी अन्य जटिलतायें विकसित हो सकती हैं। इस स्थिति में व्यक्ति कुछ ही दिनों या हफ्तों में कोमा में जा सकता है। इससे मौत भी हो सकती है, विशेष रूप से वयस्कों में। कभी-कभी व्यक्ति की जान बचाने के लिए तुरंत लिवर प्रत्यारोपण (liver transplant) किया जाता है।

कारण:

फुलमिनेंट हेपेटाइटिस ज्यादातर हेपेटाइटिस बी संक्रमित मरीजों में देखा जाता है, खासकर जब संक्रमण हेपेटाइटिस डी संक्रमण के साथ होता है (हेपेटाइटिस बी के 50 प्रतिशत मामले, फुलमिनेंट हेपेटाइटिस में बदल जाते हैं)। भारत में हेपेटाइटिस ई वायरस के साथ संक्रमण फुलमिनेंट वायरल हेपेटाइटिस का सबसे आम कारण है। एक अन्य महत्वपूर्ण कारण जहरीले पदार्थ और दवाओं की अधिक मात्रा का सेवन है, जैसा कि पश्चिमी देशों में पैरासिटामोल ओवरडोज, और भारत में एंटी-ट्यूबरकुलर दवाओं के साथ देखा गया है ।

फुलमिनेंट हेपेटाइटिस का संदेह और मूल्यांकन करने की आवश्यकता तब होती है, जब किसी व्यक्ति में निम्नलिखित समस्यायें विकसित हो जाती है:

• असामान्य पीटी/आईएनआर परीक्षणों के साथ कॉस्गुलोपैथी की अचानक शुरुआत।

• मानसिक कामकाज में अचानक गिरावट के साथ एन्सेफेलोपैथी का विकास।

• पीलिया के तेजी से विकास के साथ गंभीर बीमारी का विकास।

क्रोनिक हेपेटाइटिस के संकेत और लक्षण क्या हैं?

हेपेटाइटिस के कुछ कारण लंबे समय तक लिवर को नुकसान पहुंचाते रहते हैं, जिसके परिणामस्वरूप क्रोनिक हेपेटाइटिस की समस्या पैदा होती है। एक्यूट हेपेटाइटिस सी से ग्रसित कई लोगों में (लगभग 75 से 85 प्रतिशत), आखिर में क्रोनिक हेपेटाइटिस विकसित हो ही जाता है। हेपेटाइटिस बी, अंत में संक्रमित बच्चों में क्रोनिक हेपेटाइटिस का कारण बन सकता है (90 प्रतिशत शिशुओं में और 25 से 50 प्रतिशत छोटे बच्चों में)। हेपेटाइटिस बी संक्रमण से पीड़ित केवल 5 वयस्कों में क्रोनिक हेपेटाइटिस विकसित होता है।

लक्षण:

• बीमार होने की सामान्य भावना (अस्वस्थता)

• भूख की कमी

• कमजोरी और थकान होना

• कम तापमान का बुखार और पेट के ऊपरी हिस्से में परेशानी

सिरोसिस विकसित होने पर लक्षण आमतौर पर गैर विशिष्ट और अति-विशिष्ट होते हैं, जैसे:

• पीलिया

• पेट में तरल पदार्थ का इकट्ठा होना

• निचले अंगों में सूजन होना

• पेट की त्वचा में दिखाई देने वाले छोटी नसें

हेपेटाइटिस की पहचान कैसे की जाती है?

एक्यूट हेपेटाइटिस की पहचान चिकित्सकीय स्थिति, और खून की जाँच, जैसे लिवर फंक्शन टेस्ट और वायरल मार्कर से की जा सकती है। इसमें इमेजिंग परिक्षण या बायोप्सी की आवश्यकता कम ही होती है, जोकि आम तौर पर क्रोनिक हेपेटाइटिस और उसकी जटिलताओं का आँकलन करने के लिए किया जाता है।

 

1. खून की जाँच

लिवर फंक्शन टेस्ट (LFT):

• बिलीरुबिन (Bilirubin)

• एलेन अमीनोट्रांसफरेज़- (ALT)

• एस्पार्टेट अमीनोट्रांसफरेज़- (AST)

• अल्कालाईन फॉस्फेटेज़ (Alkaline phosphatase)

• प्रोथ्रोम्बिन टाइम (Prothrombin time)

• टोटल प्रोटीन, एल्बुमिन और ग्लोब्यूलिन (Total protein, albumin and globulin)

अन्य रक्त परीक्षण: कम्पलीट ब्लड काउंट (CBC) और कोआग्युलेशन स्टडीज (Coagulation studies)

वायरल मार्कर:

वायरल हेपेटाइटिस के कारण चिकित्सकीय रूप से अलग-अलग नहीं किये जा सकते है। इस उद्देश्य के लिए हेपेटाइटिस ए, बी, सी, डी और ई के वायरल मार्कर के लिए खून की जाँच की जाती है। ये इस प्रकार हैं:

सीरम आईजीएम एंटी-एचएवी फॉर हेपेटाइटिस ए वायरस (एचएवी)।

• हेपेटाइटिस बी वायरस के लिए सीरम एचबीएसएजी और एंटी-एचबीसी आईजीजी । सीरम एचबीएसएजी गंभीर संक्रमण का संकेत देता है। और यदि यह लगातार करने वाले परीक्षणों पर 6 महीने से अधिक समय तक बना रहता है, तो यह क्रोनिक हेपेटाइटिस का संकेत देता है। एंटी-एचबीसी आईजीजी पिछले संक्रमण का सुझाव देता है।

• हेपेटाइटिस सी वायरस (एचसीवी) की जांच के लिए सीरम एंटी एचसीवी एंटीबॉडी परीक्षण। यदि यह सकारात्मक (positive) आता है, तो इसके बाद सीरम एचसीवी-आरएनए परीक्षण द्वारा यह जांचा जाता है, कि क्या संक्रमण सक्रिय है।

• हेपेटाइटिस बी वायरस संक्रमण के लिए एंटी-एचबीसी आईजीएम और आईजीजी के साथ किए गए एचडीवी के लिए सीरम एचडीएजी।

• हेपेटाइटिस ई वायरस के लिए आईजीएम एंटी-एचईवी

ऑटोइम्यून मार्कर: निम्नलिखित परीक्षणों का उपयोग करके ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस का पता करने के लिए, एएनए (एंटीन्यूक्लियर एंटीबॉडी), एएसएमए (एंटीस्मूथ मसल एंटीबॉडी), एंटी-एलकेएम-1 (एंटी-लिवर/किडनी माइक्रोसोमल-1) एंटीबॉडी और टोटल आईजीजी या ग्लोबुलिन स्तर।

 

2. इमेजिंग अध्ययन:

• अल्ट्रासाउंड (यूएसजी): यह परिक्षण लिवर की बनावट में किसी भी असामान्यता की तलाश करने के लिए, और जटिलताओं के किसी भी संकेत को देखने के लिए किया जाता है:

– सिरोसिस के परिवर्तन: सिकुड़ा हुआ और नोड्युलर लिवर, पेट में तरल पदार्थ, असामान्य ब्लड प्रेशर के साथ फैला हुआ पोर्टल, बढ़ी हुई, स्प्लीन (spleen) आदि.

लिवर के कैंसर का सुझाव देने के लिए लिवर माॅस।

• इलास्टोग्राफी: यह परिक्षम लिवर में फाइब्रोसिस (जख्म) की उपस्थिति का पता लगाने और फाइब्रोसिस की गंभीरता को ग्रेड करने के लिए किया जाता है। यह परीक्षण आमतौर पर क्रोनिक हेपेटाइटिस के मामलों में किया जाता है। यह परीक्षण 3 प्रकार का होता है:

फाइब्रोस्कैन

– ट्रान्जियेन्ट इलास्टोग्राफी: यह फाइब्रोस्कैन के नाम से जाना जाता हैं, जोकि आमतौर पर हेपेटोलॉजिस्ट द्वारा किया जाता है।

– अकाउस्टिक रेडियेशन फोर्स इम्पल्स इलास्टोग्राफी (ARFI): यह परिक्षण रेडियोलॉजी में मौजूद उच्च स्तर की अल्ट्रासाउंड मशीन की मदद से किया जाता है। यह मोटापे से ग्रस्त और पेट में तरल पदार्थ वाले लोगों के लिए बेहतर होता है।

– मैग्नेटिक रेसोनेन्स इलास्टोग्राफी: एमआरआई का विशेष प्रकार जो फाइब्रोसिस का पता लगाता है। इसे सबसे सटीक तौर-तरीकों के रूप में माना जाता है।

 

3. लिवर बायोप्सी:

लिवर-बायोप्सी

यह एक आक्रामक परीक्षण है, जहां ऊतक का एक छोटा सा नमूना प्राप्त करने के लिए सुई लिवर में डाली जाती है, जिसकी जाँच माइक्रोस्कोप द्वारा की जाती है। यह अन्य परीक्षणों की तुलना में लिवर की कोशिकाओं में परिवर्तन और असामान्यता के बारे में अधिक विस्तृत जानकारी प्रदान करता है। हालांकि, यह आमतौर पर तब तक नहीं किया जाता है जब तक कि अन्य परीक्षण साफ परिणाम नहीं दे पाते हैं।

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