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सिर की चोट (उपचार)

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सिर की चोट का इलाज कैसे किया जाता है?

सिर की चोट का इलाज, चोट की गंभीरता और प्रकार पर निर्भर करता है। सिर की हल्की चोट में आमतौर पर चोट की जगह पर दर्द के अलावा कोई लक्षण नहीं पाये जाते हैं। इन मामलों में केवल दर्द की दवाई जैसे एसिटामिनोफेन दी जाती है, और आराम करने की सलाह दी जाती है।

NSAID’s की दर्द निवारक दवाईयाँ जैसे इबुप्रोफेन और एस्पिरिन से बचना चाहिये, जिससे की दिमाग में होने वाले खून के रिसाव (यदि वह मौजूद है) को रोका जा सके।

सिर की चोट के कारण फटने वाली खाल को धागे से सिल दिया जाता है और बैंडेज से ढक दिया जाता है।

सिर की गंभीर चोट या बिगड़ते हुये लक्षणों में तुरंत चिकित्सकीय सहायता और विशेष इलाज की आवश्यकता पड़ती है।

यह बहुत ही महत्वपूर्ण होता है, की इलाज जल्द से जल्द प्रारम्भ किया जाये, जिससे की स्थिति को खराब होने से रोका जा सके और मौत को टाला जा सके। कुछ मामलों में तुरंत सर्जरी की आवश्यकता पड़ती है। कुछ मामलों में सर्जरी की आवश्यकता नहीं पड़ती है और उन्हें इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) में रखा जाता है, जोकि इन जैसे मामलों के लिए प्रमुख होता है, और न्युरोक्रिटिकल केयर प्रदान करता है।

इन मामलों निम्न इलाज शामिल हो सकते हैं।

 

न्युरोक्रिटिकल केयर:

इंटेंसिव केयर यूनिट (ICU) में भर्ती जानलेवा ट्रोमैटिक ब्रेन इंजरी (TBI) से पीड़ित मरीजों पर विशेष ध्यान दिया जाता है। यह देखभाल न्युरो-इंटेन्सिविस्ट के देखरख में दी जाती है जोकि डाक्टर होते है, और इन जैसे मरीजों को विशेष देखभाल प्रदान करते हैं। इन मरीजों में आमतौर पर शरीर के दूसरे हिस्से में चोट के अलावा दिमाग पर गहरी चोट होती है। इन मरीजों में शरीर के महत्वपूर्ण काम काफी प्रभावित होते है जैसे कि दिल की गति (हार्ट रेट), रक्त चाप (ब्लड प्रेशर), साँस की गति, आक्सीजन सैचुरेशन (oxygen saturation) जिनकी लगातार देखरेख और ध्यान की आवश्यकता पड़ती है।

यह बहुत सारे चिकित्सकीय यंत्रों (मेडिकल डिवाईसेस) द्वारा किया जाता है जोकि निम्न हो सकती हैं।

• वेंटिलेटर: कुछ मरीज अपने आप साँस नहीं ले पाते हैं। इन मरीजों को वेंटिलेटर पर रखा जाता है जोकि उसके लिए साँस लेने और छोड़ने का काम करता है। यह ब्लड प्रेशर, साँस की गति, आक्सीजन सैचुरेशन और दिल की विधुतीय क्रिया का आकलन करता है।

• इंट्राक्रैनील प्रेशर (आईसीपी) मॉनिटर: सीएसएफ (CSF) दबाव को मापने के लिए सिर के अंदर एक छोटा कैथेटर डाला जाता है, जो इंट्राक्रैनील प्रेशर (आईसीपी) के बढ़ने पर डाक्टर का सावधान करता है।

• खाने की नली (फीडिंग ट्यूब): इस नली को नाक के रास्ते पेट के अंदर डाला जाता है जिससे मरीज को खाना और दवाई द्रव (liquid) के रूप में दिया जाता है।

• ईईजी (EEG): इन मरीजों में दौरे का पता लगाने के लिए दिमाग की गतिविधी पर ध्यान रखा जाता है।

 

दवाईयाँ:

• स्यामक और दर्दनिवारक दवाईयाँ: सिर की गंभीर चोट में ये दवाईयाँ मदद करती हैं। यह मरीज को शाँत करती हैं, उनको बदले और अक्रामक व्यवहार से बचाती है तथा दर्द को रोकती हैं।

• इंट्राक्रैनील प्रेशर (आईसीपी) को नियंत्रित करने के लिए मूत्रवर्धक या दवायें: ये दवायें दिमाग में सूजन को कम करती हैं तथा इंट्राक्रेनियल दबाव को ठीक से संभालती हैं। यह दिमाग से अतिरिक्त पानी को पेशाब के रास्ते बाहर निकालती हैं।

• दौरा रोकने की दवाईयाँ: ये दवाईयाँ उन मरीजो को दी जाती हैं जिनमें चोट लगने के एक हफ्ते के अंदर दौरा पड़ने की संभावना अधिक होती है, जिससे की दौरा पड़ने से रोका जा सके।

• एंटीबायोटिक्स: ये संक्रमण को रोकने और उसके इलाज के लिए दी जाती हैं।

 

सर्जरी:

महत्वपूर्ण प्रभाव डालने वाले खून के बड़े थक्कों को हटाने, टूटी हुयी खोपड़ी की हड्डी को ठीक करने और बह रही खून की नसों को ठीक करने के लिए सर्जरी का आवश्यकता पड़ सकती है।

ऐसे मामलों में निम्न सर्जरी का जाती है।

• सिर में होल करके थक्के को हटाना: इस सर्जरी में खोपड़ी में छेद करके थक्के को बाहर निकाला जाता है। आमतौर पर यह एपिड्यूरल हिमेटोमा के मामलों में किया जाता है।

• क्रैनियोटमी: इस सर्जरी में खोपड़ी की हड्डी के एक हिस्से को हटाकर प्रभावित हिस्से को ठीक किया जाता है जैसे कि खोपड़ी की हड्डी टूटना, खून के थक्ते को हटाना या खून की नलियों को सही करना। बाद में हड्डी के उस हिस्से को स्क्र्यु की मदद से सही जगह पर बिठा दिया जाता है।

• क्रैनिएक्टमी: ऐसे मामलों में जहाँ पर सिर के अंदर अधिक दबाव बन जाता है, वहाँ पर खोपड़ी की हड्डी के एक हिस्से को हटाकर दिमाग पर दबाव को कम किया जाता है। इस तरह यह सूजे हुये दिमाग को पर्याप्त जगह प्रदान करता है। एक विशेष प्रकार के टिस्यू (कोशिका) को दिमाग के उस खुले हुये हिस्से पर रखकर उसे खाल से ढक दिया जाता है। सूजन चले जाने के बाद, हटाये गये हड्डी के उस हिस्से को 1 से 3 महीने के बाद दुबारा उसी जगह पर लगाया जाता है। इस प्रक्रिया को क्रैनियोप्लास्टी कहा जाता है। इसके साथ कभी-कभी दबाव को कम करने के लिए थक्के और खून को भी निकाला जाता है।

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