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एन्सेफलाइटिस

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एन्सेफलाइटिस क्या है? एक्यूट इंसेफेलाइटिस सिंड्रोम क्या है?

एन्सेफलाइटिस का अर्थ मस्तिष्क की सूजन होता है। यह दो शब्दों से बना है, जहां “एन्सेहेलन”- का मतलब मस्तिष्क होता है, और “आयटिस” का मतलब सूजन होता है। यह एक ऐसी स्थिति है, जहां दिमाग में संक्रमण और विषाक्त पदार्थों के प्रति रक्षा प्रतिक्रिया के एक हिस्से के रूप में सूजन आ जाती है।

यह मैनिंजाईटिस से अलग होता है, जिसमें मस्तिष्क के चारों ओर मौजूद सुरक्षात्मक आवरण सूज जाता है।

एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम (एईएस)  एक गंभीर चिकित्सा स्थिति है, जहां व्यक्ति में तेज बुखार के साथ-साथ अन्य मानसिक स्थितियाँ जैसे भ्रम, भटकाव, प्रलाप या कोमा विकसित हो जाता है। इसमें बुखार के साथ-साथ दौरा भी पड़ सकता है और व्यक्ति की हालत तेजी से बिगड़ सकती है, जिससे कई घंटे या कुछ दिनों में मौत भी हो सकती है।

भारत में एन्सेफलाइटिस का सबसे आम कारण वायरल इंफेक्शन है। अन्य कारणों में बैक्टीरिया, परजीवी, कवक, स्पाइरोचेट्स, रसायन और विषाक्त पदार्थ शामिल हैं।

भारत में एन्सेफलाइटिस का सबसे आम कारक जापानी इंसेफेलाइटिस वायरस है। उत्तर प्रदेश (यूपी), बिहार, पश्चिम बंगाल, असम और तमिलनाडु जैसे राज्यों को जापानी एन्सेफलाइटिस प्रभावित क्षेत्र माना जाता है।

एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम अत्यधिक जानलेवा होता है, जिससे इस बीमारी से पीड़ित लगभग 30 पतिशत रोगियों की मौत हो सकती है। इससे दिमाग से संबन्धित जटिलताओं और शारीरिक विकलांगता की संभावना अधिक होती है, जो एन्सेफलाइटिस के सभी मामलों के 30-50 प्रतिशत  हो सकती है।

भारत में, यह महामारी के रूप में होता जिससे कम समय में काफी लोगों प्रभावित होते है।

जापानी एन्सेफलाइटिस ज्यादातर बच्चों को प्रभावित करता है, क्योंकि इन क्षेत्रों में अधिकांश वयस्क बचपन के संक्रमण के बाद प्राकृतिक प्रतिरक्षा विकसित कर लेते हैं। हालांकि, यह किसी भी उम्र में हो सकता है, और कम प्रतिरक्षा वाले वयस्कों को विशेष रूप से पुराने वयस्कों को प्रभावित कर सकता है।

कई मामलों में एन्सेफलाइटिस के किसी कारण की पहचान नहीं की जा सकती है। भारत में अज्ञात कारण से होने वाली महामारियां भी सामने आई हैं ।

एन्सेफलाइटिस के उपचार में आमतौर पर नब्ज के रखरखाव के साथ लक्षणों की देखरेख शामिल होती है।

अक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम से कितने लोग पीड़ित हैं?

एशियाई देशों में एन्सेफलाइटिस के ज्यादातर मामले जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस के होते हैं। यह विश्व स्तर पर हर साल लगभग 68,००० लोगों को प्रभावित करता है, जिसमें से लगभग 14,000-20,000 लोगों की मौत भी हो जाती है।

नेशनल वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) ने पाया कि, वर्ष 2018 में भारत में 10,485 लोग एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम से प्रभावित हुये, जिसमें से 632 लोगों की मौत हुयी थी। ये मामले 17 राज्यों से सामने आए थे, जिसमें ज्यादातर मामले उत्तर प्रदेश, बिहार, झारखंड, असम, कर्नाटक, मणिपुर, मेघालय, त्रिपुरा और तमिलनाडु से थे।

इससे पहले 2016 में भारत में करीब 11,651 मामले सामने आए थे, जिनमें से 1301 लोगों की मौत हुयी थी। 2016 में यूपी के गोरखपुर में, एक ही अस्पताल में 125 से ज्यादा बच्चों की मौत हुयी थी।

हाल ही में जून 2019 में एन्सेफलाइटिस के प्रकोप से बिहार के मुजफ्फरपुर में 154 बच्चों की मौत हो  गई थी।

अक्यूट एन्सेफलाइटिस के कारण क्या हैं?

एन्सेफलाइटिस की बीमारी सूक्ष्म जीवों, रासायनिक या विषाक्त पदार्थों की विविधता के कारण हो सकती है। हालांकि, कई मामलों में कारण अज्ञात रहता है ।

वायरस: एन्सेफलाइटिस के ज्ञात कारणों में से, वायरल संक्रमण सबसे आम कारण है। एशिया और भारत में सबसे आम वायरस जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस है, अन्य वायरस जो प्रकोप का कारण बने वह चंडीपुरा वायरस (CHPV), निपाह वायरस (NiV), अन्य एंटिरोवायरस, हर्प्स सिंप्लेक्स वायरस, इन्फ्लूएंजा ए वायरस, वेस्ट नील वायरस, गलसुआ, खसरा, डेंगू, पैरावोवायरस बी 4।

अन्य सूक्ष्म जीव: कम सामान्य बैक्टीरिया जैसे एस निमोनिया, स्क्रब टाइफस और अन्य, कवक, परजीवी आदि।

रासायनिक या विषाक्त पदार्थ: लीची फल में पाए जाने वाले हाइपोग्लाइसिन ए और मेथिलीन साइक्लोप्रोपिलाइसिन (एमसीपीजी) को मुजफ्फरपुर के कुपोषित बच्चों में एईएस के प्रकोप का कारण माना गया है, जिससे करीब 154 बच्चों में हाइपोग्लाइसीमिया तथा मौत का शिकार बने।

अक्यूट एन्सेफलाइटिस के विकास के लिए जोखिम कारक क्या हैं?

कई कारक हैं जो तीव्र एन्सेफलाइटिस के मामलों की अधिक संख्या से जुड़े पाए गए हैं। ये इस प्रकार हैं:

बचपन: एन्सेफलाइटिस किसी भी उम्र में हो सकता है। हालांकि 15 साल से कम उम्र के बच्चों में यह ज्यादा आम बात है। बुजुर्ग लोगों को भी एन्सेफलाइटिस विकसित होने का खतरा अधिक होता है, खासकर पहले से मौजूद बीमारीयों तथा कम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले लोगों को।

कुपोषण: इसे एन्सेफलाइटिस के विकास में एक संवेदनशील कारण माना गया है, विशेष रूप से २०19 के प्रकोप में, जिसने मुजफ्फरपुर में कुपोषित बच्चों को प्रभावित किया था।

कमजोर प्रतिरक्षा: यह व्यक्ति को संक्रमण से लड़ने और एन्सेफलाइटिस विकसित करने में असमर्थ बनाता है।

स्थानिक क्षेत्र: कुछ क्षेत्रों में एन्सेफलाइटिस कई बार होता पाया गया है।

भारत सहित दक्षिण-पूर्व एशियाई देशों को जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस का प्रभावित क्षेत्र माना जाता है।

भारत में तमिलनाडु के साथ-साथ गंगा के मैदानी रा्ज्यों जैसे उत्तर प्रदेश (यूपी), बिहार, पश्चिम बंगाल और असम को एन्सेफलाइटिस प्रभावित क्षेत्र माना जाता है।

चांदीपुरा वायरस महाराष्ट्र, गुजरात के पूर्वी हिस्सों और आंध्र प्रदेश के नागपुर जिले के क्षेत्रों में पाया गया था।

निपाह वायरस से बांग्लादेश और भारत में पश्चिम बंगाल काफी प्रभावित हुये थे।

मौसमी प्रकोप: एन्सेफलाइटिस को आमतौर पर वर्ष के एक विशेष समय के दौरान महामारी के रूप में होता हुआ पाया गया है।  सितंबर से नवंबर के महीनों में कई महामारी देखने को मिली हैं। पिछला मुजफ्फरपुर प्रकोप मई और जून महीने के लीची तोड़ने के मौसम के दौरान हुआ था जिस दौरान भीषण गर्मी पड़ी थी।

अक्यूट एन्सेफलाइटिस के संकेत और लक्षण क्या हैं?

जापानी एन्सेफलाइटिस के अधिकांश मामलों में, कोई स्पष्ट लक्षण नहीं दिखते हैं या फिर वो सामान्य होते हैं जैसे:

• बुखार आना

• सिरदर्द होना

• शरीर में दर्द होना

• कमजोरी होना

हालांकि, 250 लोगों में से लगभग 1 व्यक्ति को निम्नलिखित लक्षणों के साथ गंभीर बीमारी विकसित हो सकती है:

• बुखार की तेजी से शुरुआत

• सिरदर्द होना

• गर्दन में जकड़न होना

• भ्रम पैदा होना

• भटकाव होना

• दौरा पड़ना

• सभी चीजों का विरोध करना, या मतिभ्रम होना

• शरीर की सनसनी की हानि होना या लकवा मार जाना

• बात करने में असमर्थता होना

• चेतना की हानि होना

शिशुओं और छोटे बच्चों में, निम्नलिखित संकेत और लक्षण देखे जा सकते है, जो इस प्रकार हैं:

• शिशुओं की खोपड़ी (फॉन्टेनल्स) के नरम जगह पर उभार होना

• मिचली और उल्टी होना

• शरीर में अकड़न होना

• ठीक तरह से भोजन न कर पाना

तत्काल चिकित्सा सहायता कब लेनी है?

कोई भी व्यक्ति जिसमें थोड़े समय में बुखार के साथ मानसिक स्थिति में बदलाव जैसे  भ्रम, भटकाव, चेतना की हानि, असामान्य व्यवहार या दौरा होता है, तो एन्सेफलाइटिस के लक्षण का संकेत देता हैं, जिसमें डॉक्टर से तुरंत संपर्क करना चाहिये।

अक्यूट एन्सेफलाइटिस की जटिलताएं क्या हैं?

यह स्थिति दिमाग को प्रभावित करती है और महत्वपूर्ण शारीरिक और मानसिक हानि का कारण बन सकती है, जो सभी मामलों में से 30-50 प्रतिशत हो सकती है। जटिलताएं जो हो सकती हैं:

• बार-बार दौरा पड़ना

• यद्दाश्त खो जाना

• देखने की समस्या

• सुनने की समस्या

• व्यवहार और बौद्धिक समस्याएं

• लकवा मार जाना

• कोमा

• मृत्यु- एन्सेफलाइटिस 30 प्रतिशत तक की उच्च मृत्यु दर (केस फैटेलिटी रेट या सीएफआर) से जुड़ा हुआ है।

अक्यूट एन्सेफलाइटिस की पहचान कैसे की जाती है?

एईएस की पहचान और कारण का पता लगाने के लिए, राष्ट्रीय वेक्टर बोर्न डिजीज कंट्रोल प्रोग्राम (एनवीबीडीसीपी) इंडिया ने पहचान के कुछ मानदंड निर्धारित किए हैं। इसने एईएस के लिए देश व्यापी निगरानी कार्यक्रम भी स्थापित किये है, जिसमें जापानी एन्सेफलाइटिस (जेई) की पहचान पर अधिक जोर दिया गया है।

यह प्रहरी स्थलों (सेंटिनल साइट) की मदद से किया जा रहा है, जो एलजीएम कैप्चर एलिसा द्वारा जेई की पहचान कर रहा है, और वायरस को राष्ट्रीय संदर्भ प्रयोगशाला में अलग रखा जा रहा है ।

ये मापदंड इस प्रकार हैं:

• एक मामले को संदिग्ध तब माना जाता है, जब किसी व्यक्ति 7 दिन के अंदर तेज बुखार के मानसिक स्थिति में बदलाव जैसे भ्रम, भटकाव, प्रलाप या कोमा होता हैं।

• दौरे के विकास, जो पिछली स्थिति से न जुड़ा हो (ज्वर दौरे को छोड़कर)।

एन्सेफलाइटिस के संदिग्ध मामलों की पहचान मानदंडों को पूरा करने वाले ऐसे रोगियों को, प्रयोगशाला परिणामों के आधार पर निम्नलिखित रूप में वर्गीकृत किया जाता है:

1. प्रयोगशाला-पुष्टि मामला

निम्नलिखित मार्कर में से किसी एक के साथ पाये जाने वाले संदिग्ध मामले:

• सीरम और सीएएफ में आईजीएम एन्टीबाॅडी की मौजूदगी।

• आईजीएम/आईजीजी एलिसा, एचआई, न्युट्रलाईजेशन परीक्षण के माध्यम से युग्मित सेरा (एक्यूट एंड कन्वेलसेंट) में आईजी जी एंटीबॉडी टाइटर में चार गुना या अधिक वृद्धि।

• प्रतिरक्षण द्वारा एंटीजन डिटेक्शन

• मस्तिष्क के ऊतकों से वायरस अलगाव

• पीसीआर द्वारा न्यूक्लिक एसिड का पता लगाना

प्रहरी (सेंटिनल) निगरानी नेटवर्क में जापानी एन्सेफलाइटिस की पहचान आईजी एम कैप्चर एलिसा द्वारा किया जाता है, और वायरस को राष्ट्रीय संदर्भ प्रयोगशाला में अलग किया जाता है।

2. संभावित मामले

एक मामले को जेई का संभावित मामला तब माना जाता है, जब एक क्षेत्र और समय सीमा में एक चिकित्सकीय संदिग्ध पाया जाता है, जो प्रयोगशाला की गई जाँच से मामले की पुष्टि के करीब होता है।

3. अन्य एजेंट के कारण एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम एक चिकित्सकीय संदिग्ध मामला होता है, जहां जाँच परीक्षण से उस कारण की पहचान की जाती हेे, जो जेई नहीं होता है।

4. अज्ञात एजेंट के कारण होने वाला एक्यूट एन्सेफलाइटिस सिंड्रोम

यह एक एैसा चिकित्सकीय संदिग्ध मामला है, जहां निम्नलिखित में से कोई भी लागू होता है:

• पहचान के परीक्षण नहीं किए जाते हैं

• पहचान के परीक्षणों से किसी एटिलॉजिकल एजेंट की पहचान नहीं की जा सकती है

• पहचान के परीक्षणों के परिणाम अनिश्चित होते हैं

एन्सेफलाइटिस के लिए डायग्नोस्टिक वर्क-अप क्या है?

चिकित्सकीय इतिहास: एन्सेफलाइटिस की पहचान करने के लिए डॉक्टर भौगोलिक और लौकिक स्थिति को ध्यान में रखकर पूरा चिकिस्कीय इतिहास लेंगे।

शारीरिक परीक्षा: इसके बाद सामान्य शारीरिक और दिमागी परिक्षण होेंगे।

नैदानिक मानदंडों का उपयोग: एनवीबीडीसीपी (ऊपर चर्चा) द्वारा स्थापित नैदानिक मानदंडों के आधार पर, डॉक्टर किसी व्यक्ति को एन्सेफलाइटिस के संदिग्ध मामले के रूप में वर्गीकृत करेगा। इसके बाद व्यक्ति की स्थिति के मूल्यांकन और पहचान में सहायता के लिए प्रयोगशाला में एन्सेफलाइटिस और अन्य परीक्षण होंगे।

1. जेई वायरस का पता लगाने के लिए एईएस में किए जा सकने वाले प्रयोगशाला परीक्षण इस प्रकार हैं:

• एंटीबॉडी डिटेक्शन: ये परिक्षण एंटीबॉडी का पता लगाने के लिए किये जाते हैं जोकि शरीर जापानी एन्सेफलाइटिस वायरस के खिलाफ बनाता है।

– एंजाइम लिंक्ड इम्यूनो-सोरबांट ऐसे (एलिसा), आईजीजी (पेयर्ड) और आईजीएम (मैक) एंटीबॉडी के लिए

– हीमैगग्लूशन इनहिबिशन टेस्ट (एचआई),

– काॅम्प्लिमेंट फिक्शेसन टेस्ट (CF) आदि।

• एंटीजन डिटेक्शन: आरपीएचए, आईएफए, इम्यूनोपेरोक्सिडेस आदि।

• जीनोम डिटेक्शन – आरटीपीसीआर

• आईसोलेशन – टिस्यू कल्चर, इन्फेंट माईस आदि

विभिन्न परीक्षणों से जुड़ी सीमाओं को देखते हुए, आईजीएम एलिसा पसंद की विधि है, बशर्ते नमूने संक्रमण के 3-5 दिन के बाद एकत्र किए जाएं।

2. अन्य परीक्षण:

• ब्रेन इमेजिंग: एमआरआई या मस्तिष्क के सीटी स्कैन रोग की सीमा की जानने के लिए या अन्य समस्याओ जैसे नकसीर (हिमारेज), इंफाक्रर्ट (infarct) या ट्यूमर आदि का पता लगाने के लिए किये जाते हैं। यह कुछ मामलों में एन्सेफलाइटिस के कारणों का संकेत भी दे सकता है, जैसे हर्प्स एन्सेफलाइटिस जहां आमतौर पर दिमाग के इंफीरियर फ्रंटल और टेंम्पोरल क्षेत्र शामिल होते हैं। एमआरआई सीटी स्कैन से ज्यादा संवेदनशील माना जाता है। सीएसएफ परीक्षण के लिए लंबर पंक्चर करने से पहले इमेजिंग की जानी चाहिए।

• सीएसएफ परीक्षण: लंबर पंचर सेरेब्रोस्पाइनल तरल पदार्थ (सीएसएफ) का एक छोटा सा नमूना लेने के लिए किया जाता है, जो एक ऐसा तरल पदार्थ है जो मस्तिष्क और रीढ़ की हड्डी के चारों और मौजूद रहता है। नमूना किसी भी परिवर्तन को देखने और पहचान स्थापित करने के लिए प्रयोगशाला में किया जाता है।

• इलेक्ट्रोएंसेफेलोग्राम (ईईजी): यह परीक्षण मस्तिष्क की कोशिकाओं की गतिविधि से उत्पन्न इलेक्ट्रिक सिग्नल को पढ़ने के लिए किया जाता है। यहां इलेक्ट्रोड को सिर के ऊपर लगाया जााता है, जो इन सिग्नल को पकड़कर इसे पैटर्न के रूप में दिखाते है। विद्युत गतिविधि का एक असामान्य पैटर्न इंसेफेलाइटिस होने का संकेत दे सकता है।

• अन्य प्रयोगशाला जांच: शरीर और अंगों की सामान्य स्थिति को जानने के लिए किये जाने वाले कुछ बुनियादी प्रयोगशाला परीक्षण जैसे ब्लड रूटीन, किडनी फंक्शन टेस्ट, मूत्र परीक्षण या थ्रोट स्वैब।

• ब्रेन बायोप्सी: यह पहचान को निश्चित करने या अन्य समस्या को पहचानने के लिए किया जा सकता है, खासकर उन मामलों में जहां लक्षण बिगड़ रहे हों या उपचार मदद नहीं कर रहा हो। यहां मस्तिष्क के छोटे से ऊतक को लेकर परीक्षण के लिए भेजा जाता है।

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