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सिरोसिस (लिवर सिरोसिस)

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लिवर सिरोसिस क्या है?

लिवर सिरोसिस, क्रोनिक लिवर डीजीज का अंतिम चरण है, जहां लिवर की कोशिकाओं पर लंबे समय से चल रही चोट के कारण, लिवर गंभीर रूप से क्षतिग्रस्त और जख्मी हो जाता है।

लंबे समय से चली आ रही यह चोट निम्नलिखित स्थितियों के कारण हो सकती है:

• अत्यधिक शराब का सेवन

• लिवर का लंबे समय से वायरल संक्रमण (हेपेटाइटिस बी या सी)

• नाॅन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डीडीज (NAFLD)

ऊपर दिये गये कारण सिरोसिस के सबसे आम कारण हैं। हालांकि अन्य भी बहुत कारण हैं, जिनका वर्णन बाद में किया गया है। कई लोगों में, विभिन्न कारण सिरोसिस के विकास में योगदान दे सकते हैं।

Stages of liver disease corrected scaled

लिवर सिरोसिस के प्रकार क्या हैं और बीमारी का अपेक्षित कोर्स क्या है?

लिवर सिरोसिस को आमतौर पर एक न बदले जाने वाली स्थिति के रूप में जाना जाता है, जिसे जटिलताओं की उपस्थिति या अनुपस्थिति के आधार पर दो प्रकारों में विभाजित किया जा सकता है:

कंपन्सेटेड सिरोसिस: वह सिरोसिस जिसमें जटिलतायें नहीं होती है।

डिकंपन्सेटेड सिरोसिस: यह वह सिरोसिस हैं, जिनमें जटिलताएं विकसित होती हैं और जिसके कारण मौत का जोखिम बढ़ जाता है। ये जटिलताएं इस प्रकार से हैं:

• एसाइटिस (पेट में तरल पदार्थ)

• वैरीसियल ब्लीडिंग (खाने के पाइप में फैली रक्त वाहिकाओं के माध्यम से खून बहना)

• पीलिया

• हेपेटिक एंसेफेलोपैथी

एसाइटिस के साथ सिरोसिस की मृत्यु दर प्रति वर्ष 20 प्रतिशत है, जिसे सिरोसिस का स्टेज III कहा जाता है। वहीं दूसरी ओर, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ब्लीडिंग (खून का बहाव) के साथ सिरोसिस की मृत्यु दर प्रति वर्ष 57 प्रतिशत है, जिसे सिरोसिस का स्टेज IV कहा जाता है।

ऊपर बतायी गयी जटिलताओं के बिना सिरोसिस में शामिल हैः

स्टेज I, इसमें खाने के पाइप (वैरिस) में फैली हुई नसों का कोई सबूत नहीं होता है। इसकी मृत्यु दर प्रति वर्ष 1 प्रतिशत है।

स्टेज II, इसमें सिरोसिस केवल वैरिस की उपस्थिति के साथ होता है। इसकी मृत्यु दर प्रति वर्ष 3.4 प्रतिशत है।

लिवर सिरोसिस के क्या कारण हैं?

ऐसे कई कारण हैं, जो लंबे समय तक लिवर को नुकसान पहुंचाकर, सिरोसिस का कारण बन सकते हैं। कुछ कारण आम हैं, जिनके मामले अधिक हैं। जबकि अन्य कारण कम सामान्य हैं, जिनकी संख्या कम है।

सामान्य कारण:

• अत्यधिक मात्रा में शराब का सेवन

• लिवर का क्रोनिक वायरल इंफेक्शन जैसे, हेपेटाइटिस बी और सी। हेपेटाइटिस डी से सिरोसिस आमतौर पर कम होता है।

• नाॅन-एल्कोहलिक फैटी लिवर डीडीज (NAFLD), जहां लिवर में फैट का जमना शराब, दवाओं या संक्रमण जैसे किसी भी प्रत्यक्ष कारण के बिना होता है।

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कम सामान्य या दुर्लभ कारण:

• ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस

• हीमोक्रोमेटोसिस

• सिस्टिक फाइब्रोसिस

• पित्त रोग (Biliary disease) जैसे प्राईमरी बिलियरी सिरोसिस, प्राईमरी स्क्लेरोसिंग कोलेंजाइटिस या बिलियरी अट्रेसिया- बच्चों में पाये जाने वाले सामान्य कारण।

• विरासत में मिले विकार जैसे विल्सन डीजीज, ग्लाइकोजन स्टोरेज की कमी, एए-एन्टीट्रिप्सिन (αa-antitrypsin) की कमी और गैलेक्टोसेमिया।

• दाई तरफ की दिल की विफलता।

• दवा के रियेक्शन, जो फेनिटोन, मेथोट्रेक्सेट, एमियोडारोन आदि के साथ देखा जा सकता है।

• विटामिन ए, एसीटामिनोफेन आदि के साथ दवा विषाक्तता देखी जा सकती है।

• पर्यावरणीय जहरीले पदार्थों के संपर्क से, जैसे – पारा, सीसा, ऑर्गेनोक्लोरीन कीटनाशक।

• अज्ञात कारण (क्रिप्टोजेनिक सिरोसिस): कारण अस्पष्ट रहता है।

लीवर सिरोसिस के संकेत और लक्षण क्या हैं?

सिरोसिस के शुरूआती चरण में आमतौर पर कोई संकेत और लक्षण दिखायी नहीं देते हैं। लिवर को जैसे-जैसे नुकसान होता है और चोट पहुँचती है, वैसे-वैसे संकेत और लक्षण दिखाई देने लगते हैं, जो जटिलताओं के विकास या सिरोसिस का संकेत देते हैं।

कंपन्सेटेड सिरोसिस:

बिना किसी जटिलता के सिरोसिस से ग्रसित व्यक्ति में कोई लक्षण दिखायी नहीं देते है। सामान्य तौर पर व्यक्ति अपनी इस हालत से अनजान होता है। कुछ लोगों में हल्के लक्षण हो सकते हैं, जो हैं:

• कमजोरी, वजन घटना या कुपोषण: यह क्षतिग्रस्त लिवर द्वारा पोषक तत्वों और प्रोटीन को बनाने की असमर्थता के कारण विकसित होता है।

• नींद मे परेशानी

• सेक्स की इच्छा में कमी, स्तन वृद्धि में कमी या पुरुषों में टेस्टिस के साइज में कमी

• प्राईमरी स्क्लेरोसिंग कोलैंजाइटिस या प्राईमरी बिलियरी सिरोसिस से ग्रसित लोगों की त्वचा पर खुजली।

• एसोफेगल वैरिस: यह छोटी तथा फैली हुई नसें होती हैं, जो खाने की नली और पेट की दीवारों में देखी जाती हैं। यह लिवर की नसों में दबाव के कारण फैली होती हैं। ये आमतौर पर कंपन्सेटेड सिरोसिस के रोगियों में मौजूद होती हैं, हालांकि ये किसी लक्षण को पैदा नहीं करती हैं।

डिकंपन्सेटेड सिरोसिस:

सिरोसिस के बाद के स्टेज में, लिवर में बढ़ते हुये रक्तचाप के कारण जटिलताएं विकसित होती हैं। ये जटिलताएं निम्नलिखित लक्षणों के साथ मौजूद हो सकती हैं:

• सामान्य संकेत और लक्षण

– पीलिया– आंख की सफेदी और त्वचा पीले हो जाते हैं। यह क्षतिग्रस्त लिवर द्वारा खून से बिलीरुबिन नामक पीले रंग के कचरे को बाहर न निकाल पाने के कारण होता है।

– भूख की कमी

– अत्यधिक थकान

– नपुंसकता, स्तन वृद्धि या पुरुषों में टेस्टिस का कम आकार

– महिलाओं में पीरियड्स की कमी जो रजोनिवृत्ति (menopause) से संबंधित नहीं है

• एसाइटिस: लिवर में ब्लड प्रेशर बढ़ने (पोर्टल हाइपरटेंशन) के कारण पेट में तरल पदार्थ जमा हो जाता है। निम्नलिखित परिवर्तनों को देखकर इस बारे में पता चल सकता है:

– पेट की चौड़ाई में वृद्धि, आमतौर पर कमर पर कपड़े की जकड़न के रूप में दिखती है

– वजन बढ़ना

– सांस लेने में कठिनाई

– एसाइटिस से प्रभावित कुछ लोगों में बुखार और पेट दर्द विकसित हो सकता है, जो पेट में संक्रमण का संकेत दे सकता है (पेरिटिनाइटिस)

• पेट और घेघा (esophagus) की फैली नसों में महत्वपूर्ण दबाव के कारण एसोफेगल वैरिस फट सकता है। यह निम्न रूप में दिख सकता है

– खूनी उल्टी

– काले रंग का मल (Melena)

• दिमाग में जहरीले पदार्थों के जमा होने के कारण हेपेटिक एंसेफेलोपैथी हो सकती है। इसकी शुरूआत में व्यक्ति में अनिद्रा और भुलक्कड़पन विकसित होता है, और आखिर में उसमें भ्रम, बोलने में लड़खड़ाहट, उँघाई और अंत में कोमा विकसित हो सकता हैं।

लिवर सिरोसिस की पहचान कैसे की जाती है?

खून की जाँच

• लिवर फ़ंक्शन टेस्ट (एलएफटी)

एल्बुमिन स्तर एडवांस सिरोसिस में कम हो जाता है। यह एल्बुमिन नामक प्रोटीन का उत्पादन करने के लिए लिवर की क्षमता की जांच करता है। 3.5 ग्राम/डीएल से कम स्तर सिरोसिस का संकेत देता है, जिसका संभावित अनुपात  4.4 है।

प्रोथ्रोबिन टाइम/आईएनआर, जो लिवर में गंभीर क्षति के कारण बढ़ जाता है। इसमें सिरोसिस संभावना अनुपात 5 है।

– सिरोसिस में एएलटी और एएसटी का स्तर आमतौर पर बढ़ा हुआ होता है।

– सिरोसिस और एचसीसी के साथ सीरम एलडीएच स्तर बढ़ा हुआ होता है।

जीजीटी आमतौर पर बढ़ा हुआ होता है।

बिलीरुबिन स्तर आमतौर पर बढ़ा हुआ होता है।

• वायरल मार्कर- वायरस के कारण होने वाले लिवर संक्रमण की जाँच करने के लिए किया जाता है।

– हेपेटाइटिस बी संक्रमण के लिए हेपेटाइटिस बी सर्फेस एंटीजन, अगर पोजिटिव एंटी एचबीसी और एंटी-एचबी किया जाता है।

– हेपेटाइटिस सी संक्रमण के लिए एंटी-एचसीवी, यदि पोजिटिव एचसीवी-आरएनए किया जाता है।

• सीबीसी

– जीआई रक्तस्राव (ब्लीडिंग), अल्कोहल विषाक्तता, विटामिन की कमी, तिल्ली की बढ़ी हुई गतिविधि के कारण हीमोग्लोबिन की कमी।

– प्लेटलेट काउंट आम तौर पर कम होता है। 1,60,000/mm3 से नीचे की गिनती सिरोसिस की अत्यधिक सुक्षाव देता है।

मौजूदा फाइब्रोसिस के आकलन के लिए सीरम बायोमार्कर।

– यह परिक्षण वायरल हेपेटाइटिस के मामलों के लिए अच्छी तरह से स्थापित माना जाता है

– कई सीरम बायोमार्कर किए जाते हैं और परिणामों का उपयोग फाइब्रोसिस का स्कोर बनाने के लिए किया जाता है

पेटेंट परीक्षण जैसे फाइब्रोटेस्ट, फाइब्रोश्योर आदि।

गैर पेटेंट परीक्षण नियमित रूप से उपलब्ध प्रयोगशाला परीक्षणों का उपयोग करता है, उदाहरण के लिए: एसीटी प्लेटलेट टेस्ट स्कोर के लिए।

• सीरम क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया

– बढ़े हुए स्तर गुर्दों के काम न करने (हेपेटोरेनल सिंड्रोम) या मूत्रवर्धक के अत्यधिक उपयोग की शुरुआत का सुझाव दे सकते हैं।

• ऑटोइम्यून मार्कर टेस्ट: एंटीन्यूक्लियर एंटीबॉडी (एएनए), एंटी-स्मूथ मसल एंटीबॉडी या एंटी-केएम-1 एंटीबॉडी किसी व्यक्ति में सिरोसिस के कारण के रूप में ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस का सुझाव दे सकते हैं। यह जोखिम कारकों के साथ लोगों में किया जाना महत्वपूर्ण है जैसे कि महिला।

• हीमोक्रोमेटोसिस को सिरोसिस का कारण होने के संदेह को दूर करने के लिए सीरम फेरिटिन लेवल और ट्रांसफरिन सैचुरेशन किया जा सकता है।

सीरम कॉपर में वृद्धि और सेरुलोप्लास्मिन के स्तर में कमी विल्सन रोग का सुझाव दे सकते हैं। तांबे के लिए मूत्र परीक्षण भी किया जा सकता है जो बढ़ी हुआ मल-मूत्र का सुझाव दे सकता है।

इमेजिंग

सिरोसिस का जल्दी पता लगाने के लिए, अल्ट्रासाउंड, सीटी और एमआरआई जैसी इमेजिंग जांच विश्वसनीय नहीं होती है।

• ट्रान्जियेंट इलास्टोग्रोफी का उपयोग शूरुआती फाइब्रोसिस या सिरोसिस के लिए किया जा सकता है।

• इमेजिंग अध्ययन एडवांस/डिकंपन्सेटेड सिरोसिस में अधिक विश्वसनीय हो जाता है।

1. डॉप्लर इमेजिंग के साथ अल्ट्रासोनोग्राफी

– यह आमतौर पर सिरोसिस के लिए किया गया पहला इमेजिंग टेस्ट होता है।

– यह अक्सर सिरोसिस का पता लगाने में सक्षम होता है, विशेष रूप से उन्नत मामलों में।

– पोर्टल हाईपरटेंसन या रुकावट के लिए लिवर की नसों का मूल्यांकन कर सकता है।

– कई मामलों में लिवर के कैंसर (एचसीसी) का भी पता लगा सकता हैं, विशेष रूप से बड़े और स्पष्ट माॅश के साथ। हालांकि लिवर कैंसर का पता लगाने में सीटी या एमआरआई बेहतर होता है।

2. सीटी

– यह आम तौर पर पोजिटिव अल्ट्रासाउंड परिक्षण के बाद किया गया अगला इमेजिंग परिक्षण होता है।

– यह अल्ट्रासाउंड के मुकाबले, अधिक जानकारी देता है।

– यह संबंधित जटिलताओं जैसे कोलेटरल, लिवर माॅश में अच्छी तस्वीर देता है, विशेष रूप से डायनैमिक सीटी/ ट्राईफेसिक सीटी में।

3. लिवर इलास्टोग्राफी

– यह लिवर में फाइब्रोसिस या जख्म की मात्रा का पता लगाने और उसको निर्धारित करने के लिए किया जाता है।

– इसमें लिवर बायोप्सी की तरह, ऊतक का नमूना लेने के लिए त्वचा के माध्यम से सुई डालने की आवश्यकता नहीं होती है।

– यह किलोपास्कल नामक इकाइयों में, फाइब्रोसिस की मात्रा को मापने के लिए अल्ट्रासाउंड तरंगों का उपयोग करता है।

– यह फाइब्रोसिस को निम्नलिखित ग्रेड में बाँटता है, जोकि F0, F1, F2, F3 F4 तक होती हैं, जिससे कठोरता/फाइब्रोसिस का पता चलता है। F0 का मतलब कोई फाइब्रोसिस नहीं होता है, तथा  F4 का मतलब सिरोसिस होता है।

– F0, F1 या F4, F5 जैसे फाइब्रोसिस के सबसे कम और उच्चतम ग्रेड के बीच का पता लगाने और अंतर करने के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। F2 या F3 के बीच अंतर में कम संवेदनशीलता होती है।

– गर्भवती महिलाओं में और एसाइट्स या पेसमेकर वाले लोगों में इस परिक्षण को करने से बचा जाता है। परिक्षण की सटीकता मोटापे से ग्रस्त लोगों में प्रभावित हो सकती है।

एसाईटिक फ्लुयड टैपिंग और तरल पदार्थ की जांच

एसाइट्स वाले लोगों में एक सुई और एक सिरिंज की मदद से पेट से थोड़ी मात्रा में तरल पदार्थ लिया जाता है, जिसे जांच के लिए भेजा जाता है।

• उपयोग:

– इसका उपयोग एसाइट्स से प्रभावित लोगों में, पोर्टल हाईपरटेंशन को एसाइट्स के कारण के रूप में पुष्टि करने के लिए किया जाता है।

– यदि संक्रमण (स्पोन्टेनियस बैक्टीरियल पेरिटनाइटिस) संदिग्ध है, तो इसे किया जाता है।

• मतभेद:

• डिसेमिनेटेड इंट्रावेस्कुलर कोग्युलेशन (डीआईसी) और हाइपरफिब्रिनोलाईसिस के मामलों में मतभेद होता है।

आम तौर पर कोगुलोपैथी (जब आईएनआर 8.7 या उससे कम है) के साथ भी सुरक्षित माना जाता है, और या फिर जब प्लेटलेट काउंट 19,000/mma के बराबर या उससे अधिक होता है। इन स्तरों के बाद अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिये।

लिवर बायोप्सी

उपयोग:

• सिरोसिस की पहचान और पुष्टि करने के लिए, बायोप्सी को सबसे अच्छा परिक्षण माना जाता है। हालांकि, जब सिरोसिस की पहचान क्लिनिकल परिणामो और जाँचों से स्पष्ट हो जाती है, तब आमतौर पर इसकी आवश्यकता नहीं होती है।

• यह अच्छी सटीकता के साथ फाइब्रोसिस के ग्रेड के बीच भी अंतर कर सकता है।

• यह कई मामलों में सिरोसिस के कारण का संकेत दे सकता है, जो उपचार की योजना बनाने में मदद कर सकता है, जैसे: विल्सन रोग या हीमोक्रोमेटोसिस।

• यह लिवर कैंसर की उपस्थिति की पुष्टि भी कर सकता है, और कैंसर के प्रकारों के बीच अंतर करने में मदद कर सकता है, जैसे: एचसीसी, कोलैंगियोसार्कोमा या मिश्रित विविधता।

प्रक्रिया:

इस प्रक्रिया में लिवर में एक विशेष सुई डालकर, ऊतक का एक छोटा सा नमूना लिया जाता है। सुई को एसेप्टिक सावधानियां बरतने के साथ, लिवर में ओवरलाइंग पेट की त्वचा से गुजरना पड़ सकता है। इसमें यूएसजी या सीटी स्कैन जैसी इमेजिंग तकनीकों की मदद ली जाती है। सुई को जुगलर नस से या लेप्रोस्कोप की मदद से भी पास किया जा सकता है।

जटिलतायें

• बायोप्सी से 84 प्रतिशत तक लोगों में दर्द होता है।

• रक्तस्राव (ब्लीडिंग): 2500 में से 1 तथा 10,000 में से 1 लोगों में गंभीर रक्तस्राव हो सकता है। इसके लिए अस्पताल में भर्ती होने की और उचित इलाज की जरूरत होती है।

मतभेद

• मेजर कोगुलोपैथी

• अनियंत्रित सेप्सिस

परिणाम

सिरोसिस में बायोप्सी परिणाम दुबारा पैदा हुये नोड्यूल्स के साथ फाइब्रोसिस दिखाता है। फाइब्रोसिस की डिग्री का मूल्यांकन मेटावीर हिस्टोपैथोलॉजी स्कोर जैसे स्कोरिंग सिस्टम के माध्यम से किया जाता है

फाइब्रोसिस के ग्रेड को निम्नलिखित के रूप में वर्गीकृत किया गया है:

• F0: फाइब्रोसिस नहीं हैं।

• F1: हल्का फाइब्रोसिस है।

• F2: महत्वपूर्ण फाइब्रोसिस है।

• F3: गंभीर फाइब्रोसिस है।

• F4: सिरोसिस है।

लिवर सिरोसिस का अपेक्षित कोर्स क्या है?

रोग का पूर्वानुमान या किसी व्यक्ति को बीमारी कैसे प्रभावित करेगी, सिरोसिस के कारण और जटिलताओं के विकास पर निर्भर करता है।

प्रमुख जटिलताओं (कंपन्सेटेड सिरोसिस) के बिना सिरोसिस की मृत्यु दर कम होती है। इनमें से करीब 20 से 60 प्रतिशत लोग कुपोषण का शिकार हो सकते हैं जो उनके स्वास्थ्य को और प्रभावित कर सकता है। इसको प्रोटीन के अच्छे सेवन से रोका जा सकता है। कंपन्सेटेड सिरोसिस में मौत अक्सर गैर-लिवर स्थितियों के कारण होती है, जैसे, हृदय रोग, स्ट्रोक, गुर्दे की बीमारी या द्रोह (malignancy).

जबकि, जटिलताओं के साथ सिरोसिस (डिपिरोहोल्ड सिरोसिस) में मृत्यु दर अधिक होती है, जिसे सिरोटिक जटिलताओं के लिए जिम्मेदार माना जाता है।

पूर्वानुमान के अनुसार, सिरोसिस को 4 चरणों में वर्गीकृत किया गया है:

चरण 1: एसोफेगल वैरिस के बिना कंपन्सेटेड सिरोसिस- प्रति वर्ष 1 प्रतिशत की मृत्यु दर ।

चरण 2: एसोफेगल वैरिस के साथ कंपन्सेटेड सिरोसिस- प्रति वर्ष 3.4 प्रतिशत की मृत्यु दर।

चरण 3: एसाइट्स के साथ कंपन्सेटेड सिरोसिस-प्रति वर्ष 20 प्रतिशत की मृत्यु दर

स्टेज 4: जीआई खून के साथ कंपन्सेटेड सिरोसिस-प्रति वर्ष 57 प्रतिशत की मृत्यु दर

सिरोसिस को अभी तक न पलटी जाने वाली बीमारी माना गया है। हालांकि, हाल के निष्कर्षों ने सुझाव दिया है, कि फाइब्रोसिस को कुछ मामलों में कुछ हद तक उलट दिया जा सकता है। इस पर इलाज के भाग में चर्चा की गयी है ।

लिवर सिरोसिस का इलाज क्या है?

सिरोसिस के उपचार का उद्देश्य, लिवर की आगे होने वाली की क्षति को रोकना, लक्षणों को नियंत्रित करना और जटिलताओं का प्रबंधन करना है।

हाल ही में यह पाया गया है कि कुछ मामलों में सिरोसिस के पलटने के स्तर हासिल किए जा सकते हैं। ये मामले हो सकते हैं:

हेपेटाइटिस बी या हेपेटाइटिस सी संक्रमण वाले लोग एंटीवायरल थेरेपी लेते हैं, और निरंतर प्रतिक्रिया प्राप्त करते हैं।

अल्कोहल सिरोसिस वाले लोग जो शराब पीना पूरी तरह से बंद कर देते हैं।

एनएएसएच (NASH) के साथ बैरिएट्रिक सर्जरी कराने वाले लोग और वजन घटाने वाले लोग।

1. लाइफ स्टाइल में बदलाव:

• शराब लेने में संयम: इस बाीमारी में व्यक्ति को शराब से पूरी तरह बचना चाहिए। जो लोग पूरी तरह से शराब पीना बंद कर देते हैं, उनमें 3 साले के बाद 65 प्रतिशत लोग जीवित पाये जाते है, बजाय उनके जो शराब पीना बंद नहीं करते है।

• वजन घटाना: एनएएसएच (NASH) के साथ मोटापे से ग्रस्त लोगों को वजन कम करना चाहिए ।

• वायरल हेपेटाइटिस जोखिम कारकों से बचें: लोगों को ऐसे काम करने से बचना चाहिए, जिनसे वायरल हेपेटाइटिस होने का खतरा बढ़ा सकता है, जैसे असुरक्षित यौन संबंध, सुई साझा करना आदि।

• दवा लेने में सावधानियां: सिरोटिक्स लोगों को NSAIDs का उपयोग करने से बचना चाहिए। ये दर्द के लिए पैरासिटामोल ले सकते हैं 2 ग्राम/दिन तक (यदि शराब लेने में संयम है)। हर्बल सप्लीमेंट से बचना चाहिए।

2. आहार और सहायक देखभाल:

• एक व्यक्ति को हर दिन लगभग 1.2 से 1.5 ग्राम प्रोटीन/ प्रति किलो शरीर के  वजन के अनुसार लेना चाहिए।

• लोगों को रात भर उपवास करने से बचना चाहिए। देर शाम भोजन लेने की सलाह दी जाती है।

• एसाइट्स के मामले में किसी व्यक्ति को भोजन में सोडियम को 2000 मिलीग्राम/दिन तक सीमित करना चाहिये

तरल पदार्थ का सेवन सामान्य रखा जाता है, और यह केवल तभी प्रतिबंधित होता है, जब सीरम सोडियम का जमाव 120 से 125 mmol/L से कम हो जाता है।

3. कंपन्सेटेड सिरोसिस के लिए विशेष उपचार

• वैरीस के रक्तस्राव की रोकथाम: खाद्य पाइप में फैली नसों की उपस्थिति की जांच करने के लिए व्यक्ति को एंडोस्कोपी से गुजरना पड़ता है। यदि एंडोस्कोपी काफी बड़े वैरिस या उन वैरिस को दिखाती है जिसके फटने की उच्च संभावना होती है। तो इसके फटने और रक्तस्राव से बचने के लिए निवारक उपाय किए जाने हैं। यह निम्नलिखित तरीकों से किया जा सकता है:

– दवाएं: प्रोपेनोलोल की मौखिक गोलियां प्रारंभिक चरण में ली जा सकती हैं।

– एंडोस्कोपिक प्रक्रिया: एंडोस्कोपी की मदद से फैली रक्त वाहिकाओं का लिगेशन, दवाओं की तुलना में अधिक प्रभावी पाया गया है। इसमें मौत का खतरा कम होता है। प्रक्रिया को हर 1 से 8 सप्ताह में दोहराया जाना चाहिए जब तक कि फैली हुयी नसे पूरी तरह से खत्म न हो जाए।

• कुपोषण का प्रबंधन: कंपन्सेटेड सिरोसिस से ग्रसित लोगों (20 से 60 प्रतिशत) में रोग के दौरान कुपोषण विकसित होने की संभावना होती है। हर रोज 1 से डेढ़ ग्राम/किलो शरीर के वजन के अनुसार प्रोटीन की अधिक मात्रा लेने से इसे रोका जा सकता है।

• लिवर प्रत्यारोपण रेफरल के लिए मूल्यांकन: इन लोगों का मूल्यांकन भी डॉक्टरों द्वारा किया जाता है, और लिवर प्रत्यारोपण की आवश्यकता का आँकलन करने के लिए एक अंक दिया जाता है। यदि अंतिम चरण लिवर रोग के मॉडल का स्कोर 15 या उससे अधिक आता है, तो एक व्यक्ति को मूल्यांकन के लिए लिवर प्रत्यारोपण डॉक्टर के पास भेजा जाता है।

4. क्षतिपूर्ति सिरोसिस के लिए विशिष्ट उपचार

एक व्यक्ति को क्षतिपूर्ति के पहले एपिसोड में, प्रत्यारोपण के लिए मूल्यांकन की करवाना चाहिये।

उसे इस अवधि के दौरान प्रत्यारोपण के अलावा किसी भी सर्जरी से गुजरने से बचना चाहिए।

डिकम्पनसेटेड सिरोसिस वाले लोगों में एक और महत्वपूर्ण लक्ष्य, जटिलताओं का प्रबंधन करना और उसे आगे बिगड़ने से रोकना है।

• एसाइट्स का उपचार

• यदि पेट के अंदर तरल पदार्थ आपके पेट को तनावपूर्ण बनाता है, तो डॉक्टर तनाव को कम करने और लक्षणों को दूर करने के लिए सुई या कैथेटर का उपयोग करके तरल पदार्थ को बाहर निकाल देंगें। जांच के लिए केवल थोड़ी मात्रा में तरल पदार्थ भेजा जाता है। इसके बाद बाकी इलाज किया जाता है।

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• डॉक्टर आपसे भोजन में सोडियम की मात्रा 2००० मिलीग्राम/दिन तक  सीमित करने के लिए कहेगें। वह आपको मूत्रवर्धक भी देंगे। स्पिरोनोलेक्टोन आम तौर पर फ्यूरोमाइड के साथ या उसके बिना दिया जाता है।

• दवाओं के प्रति प्रतिक्रिया नहीं देने वाले एसाइटिस के मामले में, तरल पदार्थ को बार-बार हटाने का काम क्रमिक रूप से किया जाता है।

• इस तरह के एसाइटिस का प्रबंधन करने के लिए, टिप्स या पेरिटोनोवेनस शंट जैसी कुछ प्रक्रियाएं भी की जा सकती हैं ।

• यदि आप को एसाइटिस के साथ पेट दर्द और बुखार होता है, तो यह पेट के संक्रमण, सहज बैक्टीरियल पेरिकोनिटिस (एसबीपी) का सुझाव दे सकता है। यह एक गंभीर जटिलता है, जिस पर तत्काल चिकित्सा ध्यान देने की आवश्यकता होती है। इसका प्रबंधन करने के लिए डॉक्टर इसकी जांच करने, और उसके बाद एंटीबायोटिक उपचार शुरू करने के लिए थोड़ी मात्रा में तरल पदार्थ निकालेगे।

• सेफोटैक्सिम, पिपरासिलिन-टेजोबैक्टम, या सेफ्ट्रिएक्सोन, मेरोपेनम प्लस डैप्टोमाइसिन जैसे एंटीबायोटिक्स दिए जाते हैं।

• जो लोग संक्रमण (एसबीपी) से बच जाते हैं, उन्हें ट्रिमथोप्रिम-सल्फामिथोक्साजोल, नोरफ्लोक्सासिन के साथ दीर्घकालिक निवारक उपचार या सिप्रोफ्लोक्सासिन को रोज लेना चाहिए।

• गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल वैरिस का उपचार

– वैरिस के रक्तस्राव को रोकने के लिए, कम्पनसेटेड सिरोसिस के रोगियों में इस्तेमाल किये जाने वाले उपाय के समान ही उपाय किए जाते हैं।

– यदि आप खूनी उल्टी, काले रंग के मल या कम रक्तचाप विकसित करते हैं, तो यह रक्तस्राव वैरिस का संकेत हो सकता है। इसमें तत्काल चिकित्सा ध्यान देने की जरूरत होती है, जो आपके नब्ज को स्थिर करने, खून के बहाव को बंद करने और दुबारा होने वाले खून के बहाव के जोखिम को कम करता है।

यदि नब्ज स्थिर हैं, तो एंडोस्कोपी और स्क्लेरोथेरेपी/बैंडिंग द्वारा रक्तस्राव बंद कर दिया जाता है।

यदि नब्ज, हो रहे रक्तस्राव के साथ अस्थिर रहती हैं, तो युक्तियों के साथ पोर्टल डिकंप्रेशन का उपयोग रक्तस्राव को नियंत्रित करने के लिए किया जा सकता है।

– इस अवधि के दौरान बैक्टीरियल संक्रमण को रोकने के लिए, आपको 7 दिनों के लिए क्विनोलोन या सेफ्ट्रिएक्सोन जैसे एंटीबायोटिक्स भी दिए जाएंगे।

• हेपेटिक एंसेफेलोपैथी का उपचार

• डॉक्टर पहले उन स्थितियों की पहचान करने और उनका इलाज करने की कोशिश करेंगे, जिनके कारण हेपेटिक एंसेफेलोपैथी हो रही है। इन स्थितियों में गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल रक्तस्राव, संक्रमण आदि हो सकते हैं।

• अमोनिया के उत्पादन और अवशोषण को कम करने के लिए दवाएं भी दी जाती हैं, जिससे हेपेटिक एंसेफेलोपैथी होता है। आम तौर पर इसके लिए लैक्टुलोज दिया जाता है, जो नरम मल को प्रेरित करता है। एक खुराक, जो दिन में 3 बार नरम मल उत्पादन करती, उसकी सिफारिश की जाती है। दस्त का कारण बनने वाली खुराक से बचना चाहिये। गंभीर या रिफ्रैक्टरी हेपेटिक एंसेफेलोपैथी वाले व्यक्ति में डॉक्टर लैक्टुलोज के साथ रिफैक्सिमिन देंगे।

5. अंतिम चरण जिगर की बीमारी का उपचार/

अंतिम चरण की लिवर की बीमारी/क्रोनिक लिवर डिजीज वाले व्यक्ति को जीवित रहने के लिए लिवर ट्रांसप्लांट की जरूरत होती है ।

लिवर प्रत्यारोपण के बारे में अधिक जानें

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The loss of smell that can accompany coronavirus is unique and different from that experienced by someone with a bad…

Lancet Editor Spills the Beans

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Editors of The Lancet and the New England Journal of Medicine: Pharmaceutical Companies are so Financially Powerful They Pressure us…

मदर एंड चाइल्ड

प्रसवोत्तर जटिलतायें और देखभाल

प्रसवोत्तर जटिलतायें और देखभाल

प्रसवोत्तर अवधि क्या है? एक प्रसवोत्तर अवधि एक एैसा समय अंतराल है, जिसमें मां बच्चे को जन्म देने के बाद…

प्रसवोत्तर आहार- (बेहतर स्वास्थ्य के लिए प्रसव के बाद आहार सिफारिशें)

प्रसवोत्तर आहार- (बेहतर स्वास्थ्य के लिए प्रसव के बाद आहार सिफारिशें)

प्रसवोत्तर या स्तनपान आहार क्या है? पोस्टपार्टम डाइट वह डाइट है, जो मां को एक बार बच्चे के जन्म के…

गर्भावस्था के लिए खाद्य गाइड

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बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य के लिए खाने और बचने वाले खाद्य पदार्थों की सूची गर्भ धारण करने के बाद, बच्चे…

मन और मानसिक स्वास्थ्य

सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी) – निदान

सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी) – निदान

कैसे सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी) का निदान किया जाता है? नैदानिक इतिहास: डॉक्टर आम तौर पर लक्षणों का विस्तृत इतिहास…

सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी) – उपचार

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कैसे सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी) का इलाज किया जाता है? सामान्यीकृत चिंता विकार का उपचार लक्षणों की गंभीरता और जीवन…

सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी)

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सामान्यीकृत चिंता विकार क्या है? चिंता, किसी ऐसी चीज के बारे में परेशानी या घबराहट की भावना है, जो हो…