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सिरोसिस (लिवर सिरोसिस) – डायग्नोसिस

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लिवर सिरोसिस की पहचान कैसे की जाती है?

खून की जाँच

• लिवर फ़ंक्शन टेस्ट (एलएफटी)

एल्बुमिन स्तर एडवांस सिरोसिस में कम हो जाता है। यह एल्बुमिन नामक प्रोटीन का उत्पादन करने के लिए लिवर की क्षमता की जांच करता है। 3.5 ग्राम/डीएल से कम स्तर सिरोसिस का संकेत देता है, जिसका संभावित अनुपात  4.4 है।

प्रोथ्रोबिन टाइम/आईएनआर, जो लिवर में गंभीर क्षति के कारण बढ़ जाता है। इसमें सिरोसिस संभावना अनुपात 5 है।

– सिरोसिस में एएलटी और एएसटी का स्तर आमतौर पर बढ़ा हुआ होता है।

– सिरोसिस और एचसीसी के साथ सीरम एलडीएच स्तर बढ़ा हुआ होता है।

जीजीटी आमतौर पर बढ़ा हुआ होता है।

बिलीरुबिन स्तर आमतौर पर बढ़ा हुआ होता है।

• वायरल मार्कर- वायरस के कारण होने वाले लिवर संक्रमण की जाँच करने के लिए किया जाता है।

– हेपेटाइटिस बी संक्रमण के लिए हेपेटाइटिस बी सर्फेस एंटीजन, अगर पोजिटिव एंटी एचबीसी और एंटी-एचबी किया जाता है।

– हेपेटाइटिस सी संक्रमण के लिए एंटी-एचसीवी, यदि पोजिटिव एचसीवी-आरएनए किया जाता है।

• सीबीसी

– जीआई रक्तस्राव (ब्लीडिंग), अल्कोहल विषाक्तता, विटामिन की कमी, तिल्ली की बढ़ी हुई गतिविधि के कारण हीमोग्लोबिन की कमी।

– प्लेटलेट काउंट आम तौर पर कम होता है। 1,60,000/mm3 से नीचे की गिनती सिरोसिस की अत्यधिक सुक्षाव देता है।

मौजूदा फाइब्रोसिस के आकलन के लिए सीरम बायोमार्कर।

– यह परिक्षण वायरल हेपेटाइटिस के मामलों के लिए अच्छी तरह से स्थापित माना जाता है

– कई सीरम बायोमार्कर किए जाते हैं और परिणामों का उपयोग फाइब्रोसिस का स्कोर बनाने के लिए किया जाता है

पेटेंट परीक्षण जैसे फाइब्रोटेस्ट, फाइब्रोश्योर आदि।

गैर पेटेंट परीक्षण नियमित रूप से उपलब्ध प्रयोगशाला परीक्षणों का उपयोग करता है, उदाहरण के लिए: एसीटी प्लेटलेट टेस्ट स्कोर के लिए।

• सीरम क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया

– बढ़े हुए स्तर गुर्दों के काम न करने (हेपेटोरेनल सिंड्रोम) या मूत्रवर्धक के अत्यधिक उपयोग की शुरुआत का सुझाव दे सकते हैं।

• ऑटोइम्यून मार्कर टेस्ट: एंटीन्यूक्लियर एंटीबॉडी (एएनए), एंटी-स्मूथ मसल एंटीबॉडी या एंटी-केएम-1 एंटीबॉडी किसी व्यक्ति में सिरोसिस के कारण के रूप में ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस का सुझाव दे सकते हैं। यह जोखिम कारकों के साथ लोगों में किया जाना महत्वपूर्ण है जैसे कि महिला।

• हीमोक्रोमेटोसिस को सिरोसिस का कारण होने के संदेह को दूर करने के लिए सीरम फेरिटिन लेवल और ट्रांसफरिन सैचुरेशन किया जा सकता है।

सीरम कॉपर में वृद्धि और सेरुलोप्लास्मिन के स्तर में कमी विल्सन रोग का सुझाव दे सकते हैं। तांबे के लिए मूत्र परीक्षण भी किया जा सकता है जो बढ़ी हुआ मल-मूत्र का सुझाव दे सकता है।

इमेजिंग

सिरोसिस का जल्दी पता लगाने के लिए, अल्ट्रासाउंड, सीटी और एमआरआई जैसी इमेजिंग जांच विश्वसनीय नहीं होती है।

• ट्रान्जियेंट इलास्टोग्रोफी का उपयोग शूरुआती फाइब्रोसिस या सिरोसिस के लिए किया जा सकता है।

• इमेजिंग अध्ययन एडवांस/डिकंपन्सेटेड सिरोसिस में अधिक विश्वसनीय हो जाता है।

1. डॉप्लर इमेजिंग के साथ अल्ट्रासोनोग्राफी

– यह आमतौर पर सिरोसिस के लिए किया गया पहला इमेजिंग टेस्ट होता है।

– यह अक्सर सिरोसिस का पता लगाने में सक्षम होता है, विशेष रूप से उन्नत मामलों में।

– पोर्टल हाईपरटेंसन या रुकावट के लिए लिवर की नसों का मूल्यांकन कर सकता है।

– कई मामलों में लिवर के कैंसर (एचसीसी) का भी पता लगा सकता हैं, विशेष रूप से बड़े और स्पष्ट माॅश के साथ। हालांकि लिवर कैंसर का पता लगाने में सीटी या एमआरआई बेहतर होता है।

2. सीटी

– यह आम तौर पर पोजिटिव अल्ट्रासाउंड परिक्षण के बाद किया गया अगला इमेजिंग परिक्षण होता है।

– यह अल्ट्रासाउंड के मुकाबले, अधिक जानकारी देता है।

– यह संबंधित जटिलताओं जैसे कोलेटरल, लिवर माॅश में अच्छी तस्वीर देता है, विशेष रूप से डायनैमिक सीटी/ ट्राईफेसिक सीटी में।

3. लिवर इलास्टोग्राफी

– यह लिवर में फाइब्रोसिस या जख्म की मात्रा का पता लगाने और उसको निर्धारित करने के लिए किया जाता है।

– इसमें लिवर बायोप्सी की तरह, ऊतक का नमूना लेने के लिए त्वचा के माध्यम से सुई डालने की आवश्यकता नहीं होती है।

– यह किलोपास्कल नामक इकाइयों में, फाइब्रोसिस की मात्रा को मापने के लिए अल्ट्रासाउंड तरंगों का उपयोग करता है।

– यह फाइब्रोसिस को निम्नलिखित ग्रेड में बाँटता है, जोकि F0, F1, F2, F3 F4 तक होती हैं, जिससे कठोरता/फाइब्रोसिस का पता चलता है। F0 का मतलब कोई फाइब्रोसिस नहीं होता है, तथा  F4 का मतलब सिरोसिस होता है।

– F0, F1 या F4, F5 जैसे फाइब्रोसिस के सबसे कम और उच्चतम ग्रेड के बीच का पता लगाने और अंतर करने के लिए सर्वश्रेष्ठ होता है। F2 या F3 के बीच अंतर में कम संवेदनशीलता होती है।

– गर्भवती महिलाओं में और एसाइट्स या पेसमेकर वाले लोगों में इस परिक्षण को करने से बचा जाता है। परिक्षण की सटीकता मोटापे से ग्रस्त लोगों में प्रभावित हो सकती है।

एसाईटिक फ्लुयड टैपिंग और तरल पदार्थ की जांच

एसाइट्स वाले लोगों में एक सुई और एक सिरिंज की मदद से पेट से थोड़ी मात्रा में तरल पदार्थ लिया जाता है, जिसे जांच के लिए भेजा जाता है।

• उपयोग:

– इसका उपयोग एसाइट्स से प्रभावित लोगों में, पोर्टल हाईपरटेंशन को एसाइट्स के कारण के रूप में पुष्टि करने के लिए किया जाता है।

– यदि संक्रमण (स्पोन्टेनियस बैक्टीरियल पेरिटनाइटिस) संदिग्ध है, तो इसे किया जाता है।

• मतभेद:

• डिसेमिनेटेड इंट्रावेस्कुलर कोग्युलेशन (डीआईसी) और हाइपरफिब्रिनोलाईसिस के मामलों में मतभेद होता है।

आम तौर पर कोगुलोपैथी (जब आईएनआर 8.7 या उससे कम है) के साथ भी सुरक्षित माना जाता है, और या फिर जब प्लेटलेट काउंट 19,000/mma के बराबर या उससे अधिक होता है। इन स्तरों के बाद अत्यधिक सावधानी बरतनी चाहिये।

लिवर बायोप्सी

उपयोग:

• सिरोसिस की पहचान और पुष्टि करने के लिए, बायोप्सी को सबसे अच्छा परिक्षण माना जाता है। हालांकि, जब सिरोसिस की पहचान क्लिनिकल परिणामो और जाँचों से स्पष्ट हो जाती है, तब आमतौर पर इसकी आवश्यकता नहीं होती है।

• यह अच्छी सटीकता के साथ फाइब्रोसिस के ग्रेड के बीच भी अंतर कर सकता है।

• यह कई मामलों में सिरोसिस के कारण का संकेत दे सकता है, जो उपचार की योजना बनाने में मदद कर सकता है, जैसे: विल्सन रोग या हीमोक्रोमेटोसिस।

• यह लिवर कैंसर की उपस्थिति की पुष्टि भी कर सकता है, और कैंसर के प्रकारों के बीच अंतर करने में मदद कर सकता है, जैसे: एचसीसी, कोलैंगियोसार्कोमा या मिश्रित विविधता।

प्रक्रिया:

इस प्रक्रिया में लिवर में एक विशेष सुई डालकर, ऊतक का एक छोटा सा नमूना लिया जाता है। सुई को एसेप्टिक सावधानियां बरतने के साथ, लिवर में ओवरलाइंग पेट की त्वचा से गुजरना पड़ सकता है। इसमें यूएसजी या सीटी स्कैन जैसी इमेजिंग तकनीकों की मदद ली जाती है। सुई को जुगलर नस से या लेप्रोस्कोप की मदद से भी पास किया जा सकता है।

जटिलतायें

• बायोप्सी से 84 प्रतिशत तक लोगों में दर्द होता है।

• रक्तस्राव (ब्लीडिंग): 2500 में से 1 तथा 10,000 में से 1 लोगों में गंभीर रक्तस्राव हो सकता है। इसके लिए अस्पताल में भर्ती होने की और उचित इलाज की जरूरत होती है।

मतभेद

• मेजर कोगुलोपैथी

• अनियंत्रित सेप्सिस

परिणाम

सिरोसिस में बायोप्सी परिणाम दुबारा पैदा हुये नोड्यूल्स के साथ फाइब्रोसिस दिखाता है। फाइब्रोसिस की डिग्री का मूल्यांकन मेटावीर हिस्टोपैथोलॉजी स्कोर जैसे स्कोरिंग सिस्टम के माध्यम से किया जाता है

फाइब्रोसिस के ग्रेड को निम्नलिखित के रूप में वर्गीकृत किया गया है:

• F0: फाइब्रोसिस नहीं हैं।

• F1: हल्का फाइब्रोसिस है।

• F2: महत्वपूर्ण फाइब्रोसिस है।

• F3: गंभीर फाइब्रोसिस है।

• F4: सिरोसिस है।

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