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ब्रोन्कोएल्वियोलार लवाज

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ब्रोन्कोएल्वियोलार लवाज क्या है?

• निदान (डायग्नोसिस) के उद्देश्य से, फेफड़ों से तरल पदार्थ और कोशिकाओं को इकट्ठा करने की प्रक्रिया को ब्रोन्कोएल्वियोलार लवाज (बीएएल) कहा जाता है।

• ब्रोंकोस्कोपी नामक चिकित्सा उपकरण की मदद से हम फेफड़ों के उपखंडीय (सबसेग्मेंटल) हिस्से तक पहुंचकर उसमें सामान्य स्टराइल सेलाइन इंजेक्ट करते हैं, और फिर उसे वापस सिरिंज में खींच लेते हैं।

• इकट्ठा किये गये तरल पदार्थ का परिक्षण, संक्रमण, कैंसर, खून, और फेफड़ों से संबंधित बीमारियों के लिए किया जाता है।

ऐसा क्यों और कब किया जाता है?

• संक्रमण की पहचान करने के लिए।

• यदि आप लम्बे समय से खांसी से पीड़ित हैं।

• कोई निश्चित परिणाम न देने वाले रेडियोग्राफिक (एक्स-रे या सीटी स्कैन)।

• फेफड़ों में खून भर जाने पर (डिफ्युज एल्वोलर हिमोरेज)

• पल्मोनरी एल्वेलर प्रोटिनोसिस

• इओसिनोफिलिक निमोनिया

• हाइपरसेन्सिविटी न्यूमोनाइटिस

• ट्यूमर/कैंसर के निदान के लिए

• क्रोनिक बेरिलिओसिस

• इंटरस्टिसियल लंग डिजीज

• एस्बेस्टस

• कम रोग प्रतिरोधक क्षमता वाले रोगियों में; फेफड़े के संक्रमण के लिए।

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तकनीक

• यह प्रक्रिया व्यक्ति को बेहोश करने, और गले में सुन्न दवा का उपयोग करने, के बाद शुरू होती है।

• ब्रोंकोस्कोप (लचीला) मुंह के अंदर डालकर विंडपाइप तक बढ़ाया जाता है।

• वायुमार्ग को अच्छी तरह से देखने के लिए इसके अंत में एक फाइबर ऑप्टिक लाइट लगी होती है।

• इसमें एक छोटा सा सक्शन पोर्ट, तरल पदार्थ को एस्पिरेटे करके कैमरे को डी-फॉग करता है, जिससे संरचना को अच्छी तरह से देखने में मदद मिलती है।

• लचीली ट्यूबों को मोड़ा जा सकता है, और छोटी संरचनाओं/घावों के आसपास बेहतर नेविगेशन में मदद कर सकता है ।

• स्वास्थ्य कर्मचारी, आम तौर पर 20-60 मिलीलीटर सामान्य स्टेराइल सेलाइन का इस्तेमाल करते है। (विभिन्न अध्ययनों में 0.5 से 3 मिलीलीटर/किलोग्राम तक उपयोग की जाने वाली मात्रा)

• हाँथ से पकड़ने वाली सिरिंज की मदद से स्टेराइल सेलाइन इंजेक्ट किया जाता है, और फिर सेलाइन को वापस सिरिंज में खींच लिया जाता है।

• लगभग 5 प्रतिशत सेलाइन, सिरिंज में वापस आनी चाहिए (इंजेक्ट किया गया कुल सेलाइन का 30 प्रतिशत नमूना एकत्र किया जाना चाहिए), नहीं तो प्रक्रिया रद्द कर दी जानी चाहिए।

• प्रक्रिया को 3-5 बार दोहराया जाता है, और कुल लगभग 300 मिलीलीटर का उपयोग किया जाता है।

• प्रक्रिया पूरी होने के बाद ट्यूब को हटा दिया जाता है, और लिये गये, लैवेज तरल पदार्थ को, परीक्षण के लिए भेजा जाता है। (तरल पदार्थ की मात्रा से बने आईडी को नोट करें)

• लैवेज फ्लूएड, लिये जाने के 1 घंटे के भीतर उसे ठंड (बर्फ) में संग्रहीत करके परिक्षण के लिए ले जाया जाता है, हालांकि अध्ययनों से पता चलता है कि बीएएल तरल पदार्थ 4 घंटे के खराब नहीं होता है।

• तरल पदार्थ का अध्ययन, सफेद और लाल रक्त कोशिकाओं के लिए किया जाता है।

• अच्छे लैवेज फ्लूएड में कम से कम कुल 2 मिलियन कोशिकाएं होनी चाहिए, जो प्रति उच्च शक्ति क्षेत्र में 10 अल्वेलर मैक्रोफेज से कम नहीं हैं।

• बीएएल किये जाने के बाद, बायोप्सी और ब्रशिंग में अनावश्यक लाल रक्त कोशिकाओं से बचने के लिए लैवेज फ्लूएड एकत्र किया जाना चाहिए ।

• प्रक्रिया के बाद, व्यक्ति को कुछ घंटों के लिए खाने या पीने की अनुमति नहीं दी जाती है (जब तक कि सेडेशन खत्म नहीं हो जाता है)।

• एक बार सेडेशन खत्म हो जाने के बाद आप आइस चिप्स या पानी के छोटे घूंट के साथ शुरू कर सकते हैं, और उसके बाद धीरे-धीरेअर्द्ध ठोस भोजन ले सकते है।

• छाती का एक्स-रे चोट के लक्षणों को देखने के लिए लिया जाता है, और यदि कोई चोट होती है, तो डिस्चार्ज से पहले उनका इलाज किया जाता है।

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परिक्षण से पहले तैयारी

• प्रक्रिया से पहले कम से 6 से 12 घंटे तक न कुछ  खायें न पियें।

• खून पतला करने वाली दवाएं लेने से बचें।

• धूम्रपान का इतिहास महत्वपूर्ण होता है, क्योंकि यह लैवेज द्वारा प्राप्त कोशिकाओं की संख्या को 4-6 गुना (मुख्य रूप से मैक्रोफेज) तक बढ़ोत्तरी कर सकता है।

• प्रक्रिया से पहले, एस्पिरिन को लेने से बचें, अगर आप एस्पिरिन ले रहे हैं तो अपने डॉक्टर से सलाह लें।

• चूंकि, इस प्रक्रिया में व्यक्ति को संज्ञाहरण (एनिस्थिसिया) दिया जाता है, इसलिए मरीज की सहमति की आवश्यकता होती है।

• अस्पताल द्वारा प्रदान किए गए आरामदायक कपड़े/गाउन पहनें।

• प्रक्रिया शुरू करने से पहले व्यक्ति के रक्तचाप, हृदय गति और ऑक्सीजन के स्तर पर नजर रखी जाती है।

• इसके बाद व्यक्ति को सेडक्शन दिया जाता है, और गले को सुन्न किया जाता है (गैगिंग रिफलक्स को कम करता है)।

• इसमें व्यक्ति को, पिछले 4 हफ्तों के भीतर दिल का दौरा, एंजाइना, अनियंत्रित अतालता (अरिदमिया) या हीमोडायनामिक अस्थिरता का कोई इतिहास नहीं होना चाहिये।

जटिलतायें

• संक्रमण हो सकता है।

• सांस लेने में तकलीफ हो सकती है।

• गले में खराश (ट्यूब के पारित होने के कारण) आ सकती है।

• बुखार (30 प्रतिशत रोगियों में देखा जाता है) आ सकता है।

• फेफड़े कोलैप्स हो सकते है – यह प्रक्रिया के दौरान फेफड़ों को चोट लगने की स्थिति में होता है।

• वोकल कोर्ड में जलन हो सकती है।

• वायुमार्ग में चोट लग सकती है।

• प्लूरा और फेफड़ों के बीच हवा का संग्रह (न्यूमोथोरेक्स) हो सकता है।

• दिल की समस्या उत्पन्न हो सकती है, विशेष रूप से दिल की बीमारी वाले व्यक्ति में।

• रक्तचाप और हृदय गति में परिवर्तन (संज्ञाहरण के उपयोग के कारण) हो सकता है।

• मतली और उल्टी (संज्ञाहरण के उपयोग के कारण) आ सकती है।

• मांसपेशियों में दर्द हो सकता है।

• दिल का दौरा पड़ सकता है।

• दांतों में चोट लग सकती है।

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अलर्ट संकेत

प्रक्रिया के बाद, यदि नीचे दी गयी समस्यायें विकसित होती है, तो तुरंत डॉक्टर से संपर्क करें:

• यदि बुखार 100.4 डिग्री फ़ारेनहाइट (38 डिग्री सेल्सियस) से अधिक होता है।

• खांसी के दौरान खून आना।

• सीने में दर्द होना।

• आवाज में परिवर्तन (मात्रा या पिच में परिवर्तन) होना।

• लालिमा (रेडनेश) या IV की जगह में सूजन होना।

• सांस लेने में कठिनाई होना।

• दिल की बीमारी, अतालता (अरिदमिया) का इतिहास।

• ऑक्सीजन का स्तर कम हो जाना।

• बारबार खांसी आना।

• गैगिंग रिफ्लक्स होना।

• पल्मोनरी हाइपरटेंशन (फेफड़ों की रक्त वाहिकाओं में उच्च रक्तचाप) की समस्या पैदा होना।

• विंडपाइप (ट्रेकिया) के संकुचन के मामले में।

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लाभ

• यह परिक्षण, उन समस्याओं का पता लगाने में मदद करता है, जिन्हें एक्स-रे या सीटी स्कैन आदि पर देखा नहीं जा सकता है।

• इस परिक्षण से उन, बैक्टीरियल, फंगल या वायरस से होने वाले संक्रमण की पहचान की जा सकती है, जिनकी पहचान खून की जाँच में नहीं हो पाती है।

• फेफड़ों से तरल पदार्थ को हटा दिया जाता है।

• दवाएं पहुंचाने के लिए।

• नैदानिक और चिकित्सकीय मूल्य हो सकता है।

Research behind this article:

https://www.ncbi.nlm.nih.gov/books/NBK430762/http://www.ijciis.org/temp/IntJCritIllnInjSci53189-

3089088_083450.pdfhttps://www.ncbi.nlm.nih.gov/pmc/articles/PMC5227188/pdf/jtd-08-12-

3826.pdfhttps://err.ersjournals.com/content/errev/19/117/229.full.pdfhttps://www.ncbi.nlm.nih.gov/

https://www.atsjournals.org/doi/full/10.1164/ajrccm.162.supplement_1.maic-4

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