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एल्कोहलिक लिवर डीजीज (शराब के कारण लिवर की बीमारी)

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एल्कोहल के कारण होने वाली लिवर की बीमारी क्या है?

एल्कोहोलिक लिवर डीजीज (ALD) एक ऐसी स्थिति है, जहां अत्यधिक शराब पीने से लिवर की कोशिकाओं की बनानट में बदलाव आ जाता है, जो महत्वपूर्ण स्वास्थ्य समस्याएं पैदा कर सकती है और, जिससे यहां तक की मौत भी हो सकती है।

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लिवर की कोशिकाओं में ये बदलाव, बदले जाने  से लेकर न बदले जाने नुकसान तक हो सकते हैं। इस प्रकार ALD में लिवर की कई सारी समस्यायें शामिल होती है, जोकि हल्की और गंभीर हो सकती, जैसा कि नीचे दिया गया है:

1. एल्कोहोलिक फैटी लिवर डीजीज (ALFD): इसमें लिवर की कोशिकाओं में फैट जमा हो जाता है। यह एल्कोहल से होने वाले लिवर रोग का पहला चरण है, जिससे शराब को छोड़ने से बचा जा सकता है। यह 2 सप्ताह के दौरान अत्यधिक शराब पीने से विकसित हो सकता है। यह अत्यधिक शराब पीने वाले 90% लोगों में पाया जाता है।

2. एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस: इसमें लिवर की कोशिकायें फूल और सूज जाती है। हल्के या शुरुआती रूप में, यह स्थिति बदलने लायक होती है, और इसे ठीक किया जा सकता है। जबकि, बीमारी का गंभीर रूप लिवर की विफलता और कई बार मृत्यु का कारण बन सकता है। एक्यूट एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस लगभग 30% से 60% लोगों में मौत का कारण बन सकता है। लगभग 10 से 20% क्रॉनिक हैवी ड्रिंकर्स में, इस हेपेटाइटिस या अधिक उन्नत सिरोसिस का विकास होता हैं।

3. एल्कोहोलिक सिरोसिस: यह आखिरी चरण है, जिसमें शराब के लंबे समय तक सेवन से लिवर की कोशिकाएं क्षतिग्रस्त और फाइब्रोस्ड हो जाती हैं। यह चरण न बदल सकने वाला होता है, जिसमें बचने की उम्मीद 5 वर्षो के लिए 23% और 10 वर्षों के लिए 7% होती है। सिरोसिस के कई मामलों में, विशेष रूप से जटिल मामलों में लोगों को जिंदा रहने के लिए लिवर प्रत्यारोपण (ट्रान्सप्लान्ट) की आवश्यकता होती है।

ALD के इलाज के लिए एल्कोहल से परहेज़ जरुरी है, और ऐसा करना बीमारी के किसी भी चरण में मदद करता है। यह रोग के बढ़ने को रोकता है और जटिलताओं के विकसित होने के जोखिम को कम करता है।

एल्कोहोलिक लिवर डीजीज के लक्षण और संकेत क्या हैं?

जैसा कि पहले की पहले बताया गया है कि, ALD में लिवर कई सारी स्थितियां शामिल होती हैं, जोकि मामूली से लेकर गंभीर तक होती हैं। ये निम्नलिखित संकेतो और लक्षणों के साथ सामने आ सकती हैं:

1. एल्कोहोलिक फैटी लिवर डीजीज (ALFD): इससे पीड़ित लोग आमतौर पर स्वस्थ दिखते हैं, और इनमें कोई लक्षण दिखायी नहीं देते हैं। इनकी पहचान आमतौर पर अल्ट्रासाउंड जैसी इमेजिंग से होती है।

2. एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस: ये लोग आमतौर पर अस्वस्थ होते हैं, और इनमें कई महत्वपूर्ण लक्षण दिखायी दे सकते हैं जैसे कि:

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• पीलिया: जहां त्वचा और आंखों का रंग पीला हो जाता है।

• बुखार- कम ग्रेड

• मिचली और उल्टी

• दाईं ओर ऊपरी पेट में दर्द

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• भूख में कमी

• वजन कम होना और कुपोषण

• थकान

एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस का कोई भी मामला बिगड़ सकता है, जिसके कारण पेट में तरल इकट्ठा हो सकता है,  तथा जीआई (गैस्ट्रोइन्टेस्टाईनल) प्रणाली में और हिपैटिक एन्सेफैलोपैथी (जहां रोग मस्तिष्क को प्रभावित करता है जिससे भ्रम, एकाग्रता की कमी आ जाती है) में खून बहना शुरू हो सकता है।

3. एल्कोहोलिक सिरोसिस: सिरोसिस (कंपन्सेटेड सिरोसिस) के शुरुआती दौर में, लगभग आधे लोगों में शायद ही कोई लक्षण दिखायी देते हैं। बाकी बचे आधे लोगों में भूख कम लगना, वजन कम होना, कमजोरी और थकान जैसे लक्षण दिखायी दे सकते हैं।

इस समस्या से पीड़ित लोगों में, आखिरकार निम्नलिखित लक्षण और जटिलतायें विकसित हो जाती हैं, जिन्हें डीकंपन्सेटेड सिरोसिस कहा जाता है:

जीआई से खून बहना: एलेमेंट्री रास्ते में खून बहने से काले रंग का मल, खून की उल्टी और सांस लेने में तकलीफ (खून की कमी के कारण) आदि समस्यायें हो सकती है।

पेट में तरल इक्ट्ठा होना: इसे जलोदर (असाईटिस) कहा जाता है, जिससे पेट मे दबाव के कारण, पेट फूल जाता है, बेचैनी होती है और सांस फूलती है।

• हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी: जहरीले पदार्थों का इकट्ठा होना दिमाग को प्रभावित करता है, जिससे एकाग्रता में कमी, भ्रम, नींद आदि की समस्याएं हो सकती हैं।

एल्कोहोलिक लिवर डीजीज की जटिलतायें क्या हैं?

एल्कोहोलिक लिवर डीजीज की जटिलतायें लिवर की कोशिकाओं में नुकसान और फाइब्रोसिस के कारण होती है। यह बदले में लिवर के कामकाज को प्रभावित करता है, लिवर के भीतर रक्तचाप को बढ़ाता है, और शरीर में जहरीले पदार्थों के इक्ट्ठा होने का कारण बनता है।

जटिलतायें इस प्रकार हैं:

• वेराइसिस का बढ़ना और उससे खून बहना: लिवर की खून की नसों में बढ़े हुये दबाव (पोर्टल हाईपरटेंशन) के कारण पेट और खाने की नली के आसपास की नसों में दबाव पैदा होता है। नसें फैल जाती हैं, और जब उनके अंदर काफी दबाव विकसित होता है तो उनसे खून बहने लगता है, जिससे खून की कमी हो जाती है। ये फैली हुयी नसें सिरोसिस से पीड़ित लगभग 50% लोगों में विकसित होती हैं, और वेराइसिस से पीड़ित लगभग 10% से 30% लोगों अंत में खून बहता ही हैं.

• जलोदर (असाईटिस): लिवर की खून की नसों के भीतर दबाव पड़ने से पेट के अंदर तरल पदार्थ जमा हो जाता है। जलोदर (असाईटिस) 5 वर्षों के भीतर लगभग 30% अपूर्ण सिरोसिस में विकसित होता है। इससे पेट में गड़बड़ी, हर्निया, सांस लेने में कठिनाई और असुविधा जैसी समस्यायें हो सकती है।

• पेरिटोनिटिस: 10 से 30% लोगों के पेट में इकट्ठ हुआ तरल, संक्रमित हो जाता है। यह बार-बार हो सकता है, और इसमें प्रत्येक एपिसोड के साथ लगभग 20 से 30% लोगों की मौत हो जाती हैं।

• हेपेटिक एन्सेफैलोपैथी: लिवर की गतिविधि में कमी के कारण, इसकी जहरीले पदार्थों को बाहर निकालने की क्षमता कम हो जाती है। इससे जहरीले पदार्थ एक जगह इक्ट्ठा हो जाते है, जो दिमाग पर गंभीर प्रभाव डालते है। इससे भ्रम, दिशानिर्देशों, एकाग्रता की कमी या नींद की समस्या उत्पन्न हो जाती है। यह सिरोसिस से पीड़ित लगभग 20% लोगों में विकसित होता है।

• किडनी फेल होना: बीमार लिवर, किडनी में खून के बहाव को प्रभावित कर सकता है, जो बदले में किडनी को नुकसान पहुंचाता है

• लिवर कैंसर: एल्कोहोलिक सिरोसिस वाले लगभग 5 से 15% लोगों में हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा (एचसीसी) विकसित होता हैं। हेपेटाइटिस सी संक्रमण होने पर जोखिम 100 गुना तक बढ़ जाता है

एल्कोहोलिक लिवर डीजीज का पूर्वानुमान या अपेक्षित कोर्स क्या है?

रोग का अपेक्षित कोर्स और व्यक्ति पर इसका प्रभाव, बीमारी के प्रकार पर निर्भर करता है।

• साधारण फैटी लिवर, 4 से 6 सप्ताह के भीतर शराब के न पीने से पूरी तरह से उलट हो सकता है। फैटी लिवर के केवल 5 से 10% मामलों में, शराब छोड़ने के बाद भी फाइब्रोसिस और सिरोसिस हो सकता है।

• ज्यादा शराब पीने वाले लगभग 10 से 20% लोगो में आखिर में हेपेटाइटिस या सिरोसिस जैसी बीमारी विकसित हो जाती है।

• अक्यूट एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस लगभग 30% से 60% लोगों में मृत्यु का कारण बन सकता है।

• एल्कोहोलिक सिरोसिस में जीवित रहने की दर बहुत कम है, जहां केवल 23% लोग 5 साल तक जीवित रहते हैं और 7% लोग 10 साल तक जीवित रहते हैं।

एल्कोहोलिक लिवर डीजीज की प्रगति

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ALD का कारण क्या है? ALD के विकास के लिए शराब के सेवन को कितना जिम्मेदार माना जाता है?

जैसा कि नाम से ही पता चलता है, एल्कोहोलिक लिवर डीजीज का कारण शराब का अत्यधिक सेवन है।

शराब के अत्यधिक सेवन को निम्नलिखित रूप में परिभाषित किया गया हैः

पुरुषों में प्रति दिन 3 से अधिक ड्रिंक और महिलाओं में प्रति दिन 2 से अधिक ड्रिंक। या

बिंज ड्रिंकिंग, इसमें पुरूष और महिला, महीने के एक दिन में एक ही बार में क्रमशः 5 से अधिक (पुरूष) और 4 से अधिक (महिला) ड्रिंक का सेवन करते हैं।

यह अनुमान लगाया गया है कि, पुरुषों में एक दिन में 3 से 5 से अधिक ड्रिंक, और महिलाओं में एक दिन में 1½ से 3 ड्रिंक, का आमतौर पर 10 से 12 साल तक सेवन एल्कोहोलिक लिवर डीजीज के विकास के लिए जिम्मेदार है।

हालांकि, एल्कोहल की कोई सीमा सुरक्षित नहीं मानी जाती है। व्यक्ति को लिवर की बीमारी और शरीर में किसी भी स्थिति के विकसित होने से बचने के लिए शराब का सेवन करने से बचना चाहिए।

ऊपर दिये गये ड्रिंक की संख्या का मूल्य अमेरिकी मानकों के अनुसार हैं, जहां एक मानक पेय में 14 ग्राम शराब होती है। विभिन्न मादक पेय पदार्थों के मानक पेय के संदर्भ मूल्य दिए गए हैं:

• बीयर: 350 मिलीलीटर बीयर में एल्कोहल की मात्रा 5% होती है।

• वाइन: लगभग 150 मिलीलीटर वाइन में एल्कोहल की मात्रा 12%  होती है।

• डिस्टिल्ड स्पिरिट: 45 मिलीलीटर डिस्टिल्ड स्पिरिट जैसे व्हिस्की, स्कॉच, रम, टकीला, वोदका और अन्य में, एल्कोहल की मात्रा 40% होती है।

शराब लिवर कोशिकाओं को किस तरह नुकसान पहुंचाती है?

शराब नीचे दिए गए विभिन्न मैकेनिज्म द्वारा एल्कोहल लिवर डीजीज के विकास का कारण बनती है:

• फैट का जमाव: शराब फैट के पाचन को प्रभावित करके लिवर में फैट के जमने का कारण बनता है, जो फैट को ग्लूकोज में बदलने से रोकता है।

फ्री रेडिकल जनरेशन: क्रोनिक एल्कोहल के सेवन से फ्री रेडिकल्स का निर्माण होता है, जो सूजन उत्पन्न करता है, और लिवर सेल को नुकसान पहुंचाता है, जो बाद में फाइब्रोसिस और चोट पैदा करता है।

• एंटीऑक्सिडेंट्स की कमी: ज्यादा शराब पीने वाले लोगों में विटामिन ई और ग्लूटाथियोन जैसे एंटी ऑक्सीडेंट की कमी पाई जाती है, जो लिवर की कोशिकाओं को नुकसान से बचाने वाले फ्री रेडिकल्स को नष्ट कर देती है।

शराब से संबंधित लिवर की बीमारी कितनी आम है?

यह अनुमान है कि दुनिया में लगभग 200 करोड़ लोग (25% से अधिक) शराब पीते हैं, जिनमें से 7.5 करोड़ से अधिक लोगों में शराब का उपयोग करने संबंधित बीमारी पायी जाती है।

हर साल लगभग 20 लाख मौतें लीवर की बीमारियों के कारण होती हैं, जिनमें से 10 लाख मौतें सिरोसिस के कारण होती हैं।

भारत में, शराब को सिरोसिस के सबसे सामान्य कारण के रूप में पाया जाता है, जो सभी मामलों का एक तिहाई से अधिक है।

लिवर प्रत्यारोपण की दर, जिसे बिगड़े हुये सिरोसिस का उपचार माना जाता है, वैश्विक आवश्यकता के 10% से कम है।

एल्कोहलिक लिवर डीजीज की पहचान कैसे की जाती है?

एएलडी के डायग्नोस्टिक क्रियाओं में निम्नलिखित शामिल हैं:

I. मेडिकल इतिहास: जोकि एएलडी वर्कअप का पहला और महत्वपूर्ण कदम है। डॉक्टर शराब के सेवन पर जोर देकर मरीज से उसका पूरा इतिहास लेंगे। डॉक्टर शराब के सेवन की मात्रा और अवधि के बारे में पूछेंगे। यदि लंबे समय तक शराब (पुरुषों में 3 से अधिक पेय और महिलाओं में 2 से अधिक पेय) का अत्यधिक सेवन है, तो वह आपके एएलडी विकसित करने के उच्च जोखिम पर विचार करेंगे। वह आपका मूल्यांकन करने के लिए प्रयोगशाला परीक्षण और इमेजिंग का आदेश देंगे। इस प्रकार, सही जानकारी देना और खुद का ठीक से मूल्यांकन करना बहुत महत्वपूर्ण हो जाता है।

डॉक्टर शराब के सेवन वाले लोगों की पहचान करने के लिए स्क्रीनिंग टूल का भी इस्तेमाल कर सकते हैं। इस उद्देश्य के लिए आमतौर पर उपयोग किए जाना वाला उपकरण, ऑडिट (अल्कोहल यूज डिस्आर्डर विकार इन्वेंट्री टेस्ट) है।

शराब पर निर्भरता या शराब के दुरुपयोग का पता लगाने के लिए अपने लेखा परीक्षा स्कोर को जाने।

II. सामान्य परीक्षण: एल्कोहलिक लिवर डीजीज का पता लगाने के लिए लोगों में निम्नलिखित परीक्षणों की सलाह दी जाती है:

1. रक्त परीक्षण: एएसटी, एएलटी, जीजीटी और बिलीरुबिन सहित एलएफटी सभी लोगों में किया जाता है। सीरम एल्बुमिन, प्रोथ्रोबिन/आईएनआर, और प्लेटलेट काउंट के साथ सीबीसी की आवश्यकता विशेष रूप से फाइब्रोसिस या सिरोसिस के मामलों में होती है ।

एलएफटी और खून की रिपोर्ट एएलडी में कैसी दिखेगी, इसके बारे में जाने

2. पेट का अल्ट्रासाउंड: यह परिक्षण लिवर की बनावट में किसी भी असामान्यता की जाँच करने के लिए किया जाता है, जो एएलडी का संकेत दे सकता है जैसे, फैटी लिवर या सिरोसिस। सिरोसिस के कुछ मामले जिनमें संरचना में हल्का बदलाव पाया जाात है, अल्ट्रासाउंड में पकड़ में नहीं आते हैं। ऐसे मामलों में सीटी या एमआरआई करने की आवश्यकता होती है।

3. पेट का डॉप्लर: लिवर की नसों (पोर्टल हाईपरटेंसन) के भीतर बढ़े हुये ब्लड प्रेशर को जाँचने के लिए किया जाता है।

4. फाइब्रोस्कैन/इलास्टोग्राफी भी की जाती है, जो फाइब्रोसिस का पता लगाने और ग्रेड करने के लिए अल्ट्रासाउंड मशीन का उपयोग करती है। फाइब्रोसिस, जोकि लिवर की क्षति का सुझाव देता है, केवल इस परिक्षण से पता चल सकता है, या एक अधिक आक्रामक परिक्षण  जिसे लिवर बायोप्सी कहा जाता है।

III. अतिरिक्त परीक्षण: यदि उपरोक्त परीक्षण लिवर की बीमारी का संकेत देते हैं, तो अन्य बीमारियों के संदेह को खत्म करने के लिए निम्नलिखित परीक्षण किए जा सकते हैं:

1. हेपेटाइटिस बी और सी सीरोलॉजी: एचबीएसएजी, एंटी-एचबीसी आईजीजी और एंटी-एचसीवी परिक्षणों के साथ लिवर के वायरल संक्रमण के संदेह को हटाने के लिए किया जात है।

2. ऑटोइम्यून मार्कर: निम्नलिखित परीक्षणों का उपयोग करके ऑटोइम्यून हेपेटाइटिस का पता लगाने के लिए, एएनए (एंटीन्यूक्लियर एंटीबॉडी), एएसएमए (एंटीस्मूथ मसल एंटीबॉडी), एंटी-एलकेएम-1 (एंटी-लिवर/किडनी माइक्रोसोमल-1) एंटीबॉडी और टोटल आईजीजी या वाई-ग्लोबुलिन स्तर।

3. हीमेक्रोमेेटोसिस का संदेह दूर करने के लिए ट्रान्सफेरिन और ट्रान्सफेरिन सैचुरेशन

4. अल्फा1-एंटीट्रिप्सिन लेवल इसकी कमी से इंकार करने के लिए।

5. विल्सन रोग की जाँच करने के लिए सेरुलोप्लास्मिन लेवल।

Iv. लिवर बायोप्सी आमतौर नहीं की जाती, केवल निम्नलिखित मामलों को छोड़कर:

1. हेपेटाइटिस के गंभीर मामलों के साथ अचानक बुखार, पीलिया या पेट दर्द।

2. असामान्य मामले

3. रोग की गंभीरता को निश्चित करने के लिए

एलएफटी में खून की रिपोर्ट एएलडी में कैसी दिखेगी, इसके बारे में जाने

1. एलएफटी

A) एएसटी (SGOT) और एएलटी (एसजीपीटी) बढ़े होते है, जिसमें एएसटी (SGOT) वैल्यू, एएलटी (एसजीपीटी) से अधिक होती है.

• एएलटी (एसजीपीटी) की सामान्य वैल्यू 45 यू/एल तक और एएसटी (एसजीओटी) की सामान्य वैल्यू 35 यू/एल तक होती है।

• जब एएसटी: एएलटी 3 गुना से अधिक होता है, तो यह एएलडी का अत्यधिक संकेत देता है।

• एएसटी/एएलटी आमतौर पर 300 यूनिट/mL से अधिक नहीं।

• एएसटी और एएलटी वैल्यू साधारण फैटी लिवर या सिरोसिस में भी सामान्य हो सकते हैं।

B) जीजीटी वैल्यू, एल्कोहलिक हेपेटाइटिस में आमतौर पर 100 U/mL से ऊपर होती है (सामान्य वैल्यू 0 से 30 यू/एल)। आमतौर पर जीजीटी, एएलडी में बढ़ा होता है, लेकिन उन्नत रोग में कम महत्वपूर्ण होता है।

ग) बिलीरुबिन: बिलीरुबिन वैल्यू  फैची लिवर में सामान्य (0.2 से 1.7 मिलीग्राम/dL) होती है, लेकिन, एडवान्स्ड एएलडी में बढी हो सकती है। यह एल्कोहलिक हेपेटाइटिस में आमतौर पर 3mg/dL से ज्यादा होती है।

2. सीबीसी

• एमसीवी (मीन कॉर्पस्कुलर वॉल्यूम) अधिक हो सकता है।

• उच्च टीएलसी या

• लो प्लेटलेट काउंट को आमतौर पर एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस में देखा जा सकता है।

3. पीटी/आईएनआर

• पीटी (प्रोथ्रोम्बिन टाइम) आमतौर पर एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस और सिरोसिस में अधिक होता है।

4. एल्बुमिन

लो एल्बुमिन लेवल,  ए़डवान्स्ड लिवर डीजीज में देखा जाता है।

5. सीरम क्रिएटिनिन और ब्लड यूरिया

लिवर की बीमारी के मरीज में, बढ़ा हुआ लेवल, लिवर की बीमारी की शुरुआत का संकेत कर सकता है।

इसका इलाज कैसे किया जाता है?

एल्कोहलिक लिवर डीजीज के इलाज में शराब छोड़ना, सहायक उपचार, दवायें और यदि आवश्यक हो तो लिवर ट्रान्सप्लान्ट शामिल होते है।

शराब छोड़ना:

• रोग के किसी भी चरण में, शराब छोड़ने से रोग की प्रगति और जटिलता के विकास के जोखिम को कम किया जा सकता है।

• सामान्य फैटी लिवर को, संयम के साथ ठीक किया जा सकता है।

• एडवान्स्ड लिवर डीजीज/सिरोसिस (पेट में तरल पदार्थ, एन्सेफेलोपैथी आदि) में जटिलताओं की प्रारंभिक अवस्था को, शराब छोड़ने से नियंत्रित किया जा सकता है।

• जिस व्यक्ति को एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस का पता चलता है, उसे अपने जीवन में फिर से शराब नहीं पीनी चाहिए।

• शराब पर निर्भरता वाले लोगों को अक्सर, इससे छुटकारा प्राप्त करने के लिए चिकित्सा सहायता की आवश्यकता होती है। यह निम्नलिखित साधनों से किया जा सकता है:

– डॉक्टर या शराब की लत छुड़ाने वाले विशेषज्ञ से परामर्श करके।

– इसमें बैकोफेन जैसी दवाएं सुरक्षित और प्रभावी मानी जाती हैं।

– एल्कोहल अनोनिमस जैसे सहायता समूह

पोषण सहायता:

• इसमें आवश्यक कैलोरी, विटामिन और सूक्ष्म पोषक तत्व शामिल होते हैं।

• डॉक्टर एक विशेष आहार का सुझाव दे सकते है, और आपको आहार विशेषज्ञ (डायटिसियन) के पास भेज सकते है।

• कुछ रोगियों को पेट से या आईवी लाइन से पारित ट्यूब के माध्यम से खिलाया जा सकता है।

• एएलडी वाले लोगों के लिए विशिष्ट मानक फ़ीड में प्रति दिन 1.2 से 1.5 ग्राम/किलो प्रोटीन और 35 से 40 किलो कैलोरी/किलो होता है।

विटामिन बी सप्लिमेंट की भी आवश्यकता हो सकती है, जिसे मुँह की तुलना में आईवी लाइन के माध्यम से देना पसंद किया जाता है।

दवायें:

कोर्टिकोस्टेरॉयड: इन दवाओं में एंटी इंफ्लामेट्री तत्व होते है, और एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस से प्रभावित लगभग आधे लोगों (46 प्रतिशत) के जीवन को बढ़ाने में, अल्पकालिक लाभ देते है।

– हालांकि, इन दवाओं के महत्वपूर्ण दुष्प्रभाव होते हैं, खासकर यदि इन्हे लंबे समय तक लिया जाता है। इन्हें आम तौर पर लिवर फेल्यर, गैस्ट्रोइंटेस्टाइनल ब्लीडिंग, या संक्रमण वाले लोगों को देने से बचना चाहिये।

– प्रडिनिसोलोन ओरल सोल्युसन आम तौर पर 28 दिनों के लिए एक, या विभाजित खुराक (40 मिलीग्राम/दिन की खुराक) में दिया जाता है, और उसके बाद 2 सप्ताह के टेपर में दिया जाता है.

• पेंटोक्सिफिलाइन: यह एक एंटी-इंफ्लामेट्री दवा है, जो गंभीर एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस वाले कुछ लोगों को दी जाती है। पेंटोक्सिफिलाइन का समग्र लाभ स्थापित नहीं है। यह उन लोगों को दिया जाता है, जो कोर्टिकोस्टेरॉयड नहीं ले सकते हैं।

• एंटीबायोटिक्स: एएलडी के रोगियों में संक्रमण का प्रबंधन करने के लिए एंटीबायोटिक दवाएं दी जाती हैं। यदि कोई व्यक्ति गंभीर रूप से बीमार है और उसे सेप्सिस होने की आशंका है, तो व्यापक स्पेक्ट्रम एंटीबायोटिक दिए जाते हैं । पिपरासिलिन-टैजोबैक्टम आम तौर पर दी जाने वाली एंटीबायोटिक है।

एंडोस्कोपी और स्क्लेरोथेरेपी: यदि एएलडी वाला व्यक्ति को खून की उल्टी होती है, तो खाने के पाइप में मौजूद फैली हुयी नसों से रक्तस्राव (ब्लीडिंग) की उच्च संभावना होती है। इन लोगों में esophageal varices की जांच की जानी चाहिये, जो रक्तस्राव को रोकने के लिए स्क्लेरोथेरेपी के बाद किया जा सकता है।

लिवर प्रत्यारोपण

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• लिवर ट्रांसप्लांट एंड स्टेज लिवर डिजीज के लिए सबसे कारगर इलाज है।

• अल्कोहलिक सिरोसिस, प्रत्यारोपण के सबसे आम कारण में से एक है।

• एस्साइट्स, पेरिथोनिटिस, हेपेटिक एंसेफेलोपैथी, वैरिसल रक्तस्राव जैसी जटिलताओं वाले उन्नत सिरोसिस वाले व्यक्ति को प्रत्यारोपण केंद्र से परामर्श लेना चाहिए।

• अध्ययनों से पता चला है कि, गंभीर हेपेटाइटिस रोगी जो जल्दी लिवर प्रत्यारोपण कराते है, उनमें 2 साल की अवधि के बाद भी जीवित रहने की दर बेहतर होती है, बजाय उन लोगों के जो प्रत्यारोपण नहीं कराते हैं।

• अधिकांश प्रत्यारोपण केंद्र, प्रत्यारोपण का चयन करने से पहले, शराब को 6 महीने तक छोड़ने के लिए कहते हैं। हालांकि, लिवर प्रत्यारोपण के लिए निर्णय केवल 6 महीने के संयम पर आधारित नहीं होना चाहिए।

एल्कोहोलिक लिवर डीजीज के विकसित होने को कैसे रोका जाना चाहिये?

रोकथाम

आप एल्कोहलिक हेपेटाइटिस के जोखिम को कम कर सकते हैं, यदि आप:

• शराब पीने में संयम बरतते हैं, या बिल्कुल नहीं पीते है। स्वस्थ वयस्कों के लिए, मध्यम ड्रिंक का मतलब है एक दिन में एक ड्रिंक। सभी उम्र की महिलाओं और 65 से अधिक उम्र के पुरुषों के लिए एक ड्रिंक। 65 साल के पुरुषों और जवान लोगो में एक दिन में दो पेय। एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस को रोकने का एकमात्र निश्चित तरीका शराब के सेवन से बचना है।

• हेपेटाइटिस सी से खुद को बचाएं। हेपेटाइटिस सी एक संक्रामक लिवर की बीमारी है, जो वायरस के कारण होती है। अगर इसका इलाज न किया जाये तो, यह सिरोसिस का कारण बन सकता है। यदि आपको हेपेटाइटिस सी है और शराब पीते हैं, तो आप को सिरोसिस विकसित करने की संभावना अधिक होती है।

• दवा लेने के दौरान, शराब के सेवन से पहले जांच करें। अपने डॉक्टर से पूछें कि क्या पर्चे की दवाएं लेते समय शराब पीना सुरक्षित है। ओवर-द-काउंटर दवाओं पर चेतावनी लेबल पढ़ें। दवाई लेते समय शराब न पीएं, जो शराब के साथ संयुक्त होने पर जटिलताओं की चेतावनी देते हैं – विशेष रूप से दर्द रिलीवर्स जैसे एसीटामिनोफेन (टायलेनॉल, अन्य)।

एल्कोहोलिक लिवर डीजीज होने के लिए जोखिम कारक क्या हैं?

• शराब की खपत की मात्रा: एक प्रमुख जोखिम कारक माना जाता है। इसकी कोई सीमा नहीं है। हालांकि, यह अनुमान लगाया गया है कि पुरुषों में एक दिन में 3 से 5 से अधिक ड्रिंक और महिलाओं में एक दिन में 1½ से 3 ड्रिंक की औमतौर पर 10 से 12 साल तक की खपत एल्कोहोलिक लिवर डीजीज के विकास के लिए जिम्मेदार है।

• को-एग्जिस्टिंग लिवर रोग: जैसे हेपेटाइटिस बी या हेपेटाइटिस सी जोकि लिवर की क्षति और सिरोसिस के विकास की संभावना को बढ़ा सकता है। शराब के अत्यधिक सेवन से, हेपेटाइटिस सी के कारण होने वाले सिरोसिस की संभावना 100 गुना बढ़ जाती है।

• मोटापा: एल्कोहोलिक लिवर डीजीज के विकास के जोखिम को बढ़ाता है। ज्यादा शराब पीने वालों में सिरोसिस विकसित होने का जोखिम दोगुना होता है जिनका वजन पिछले 10 वर्षों से ज्यादा हैं।

• सिगरेट पीने से: लिवर की बीमारी और हेपेटोसेलुलर कार्सिनोमा विकसित होने का खतरा बढ़ जाता है

• विटामिन बी की कमीः जैसे विटामिन बी (थायमिन, पाइरिडोक्सिन), फोलिक एसिड आदि, ज्यादा शराब पीने वालों में ALD के विकास के जोखिम को बढ़ा सकते हैं।

• आयु: एल्कोहोलिक हेपेटाइटिस आमतौर पर 40 से 50 वर्ष की आयु के बीच होता है।

• सेक्स: महिलाओं में ALD विकसित होने का खतरा पुरूषों से अधिक होता है, फिर चाहें वे समान मात्रा में शराब का सेवन करते हैं। यह महिलाओं के शरीर में अधिक फैट के कारण और एंजाइम (एल्कोहल डिहाइड्रोजनेज) की कम गतिविधि के कारण होता है।

• जेनेटिक कारक: कुछ आनुवांशिक कारक व्यक्ति में शराब के उपयोग के लिए जिम्मेदार होते है, और एल्कोहोलिक लिवर की बीमारी के विकास के लिए जिम्मेदार होते है।

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प्रसवोत्तर आहार- (बेहतर स्वास्थ्य के लिए प्रसव के बाद आहार सिफारिशें)

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प्रसवोत्तर या स्तनपान आहार क्या है? पोस्टपार्टम डाइट वह डाइट है, जो मां को एक बार बच्चे के जन्म के…

गर्भावस्था के लिए खाद्य गाइड

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बच्चे के बेहतर स्वास्थ्य के लिए खाने और बचने वाले खाद्य पदार्थों की सूची गर्भ धारण करने के बाद, बच्चे…

मन और मानसिक स्वास्थ्य

सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी) – निदान

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कैसे सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी) का निदान किया जाता है? नैदानिक इतिहास: डॉक्टर आम तौर पर लक्षणों का विस्तृत इतिहास…

सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी) – उपचार

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कैसे सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी) का इलाज किया जाता है? सामान्यीकृत चिंता विकार का उपचार लक्षणों की गंभीरता और जीवन…

सामान्यीकृत चिंता विकार (जीएडी)

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सामान्यीकृत चिंता विकार क्या है? चिंता, किसी ऐसी चीज के बारे में परेशानी या घबराहट की भावना है, जो हो…