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डिप्रेशन (अवसाद)

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डिप्रेशन (अवसाद) क्या है?

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डिप्रेशन एक ऐसी गँभीर बीमारी है, जोकि मनोदशा (मूड) में नकारात्मक बदलाव लाती है। इसके कारण मन हमेशा दुखी रहता है या काम करने में मन नहीं लगता है। ये नकारात्मक बदलाव व्यक्ति में सोचने और काम करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं, जिसके कारण रोजमर्रा के कामों को करने में परेशानी होती है।

ये लक्षण कम से कम 2 हफ्ते तक रहते हैं। ये लक्षण पीड़ित व्यक्ति को दिन के ज्यादातर समय प्रभावित करते हैं। कुछ लोगो में गंभीर लक्षण के कारण, उन्हें अपना जीवन बेकार लगने लगता है, जिससे लोगों में आत्महत्या की भावना पैदा होती है, और कुछ लोग आत्महत्या कर भी लेते हैं।

अच्छी बात यह है कि, ज्यादातर लोगों में अवसाद को रोका जा सकता है, और यह ठीक भी हो जाता है। हांलांकि ऐसा पाया गया है कि, कम और मध्यम आय वर्ग के देशो में लगभग 76 से 85 प्रतिशत लोगों को इसका ठीक इलाज उपलब्ध नहीं हो पाता है

डिप्रेशन कितने लोगों में पाया जाता है?

ऐसा अनुमान है कि, विश्व में लगभग 26.4 करोड़ लोग डिप्रेशन की बीमारी से ग्रस्त है। डिप्रेशन बच्चों, किशोरों, वयस्कों और बूढ़ों में से किसी को भी हो सकता है।

डिप्रेशन आत्महत्या का एक प्रमुख कारण है, जिससे लगभग 2 से 6 प्रतिशत तक मौते होती है।

डिप्रेशन विश्व में विकलांगता का एक प्रमुख कारण है, जोकि व्यक्ति की रोजमर्रा की जिंदगी, काम करने की क्षमता और खुशहाल जीवन को प्रभावित करता है। यह समस्या पुरूषों के मुकाबले महिलाओं में अधिक होती है। NMHS India के अनुसार 13 से 17 वर्ष के लगभग 7.3 प्रतिशत बच्चे अवसाद (डिप्रेशन) से ग्रस्त हैं।

आप कैसे जान सकते हैं कि आप डिप्रेशन के शिकार हैं या आपको दुख और वियोग की पीड़ा है?

प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में अच्छे और बुरे दोनों अनुभवों से गुजरता है। ये अनुभव तरह-तरह की भावनाये पैदा करते हैं, जोकि खुशी या गम दोनों हो सकते है। एक व्यक्ति का कई तरह के नकारात्मक अनुभवों जैसे आर्थिक समस्या, खराब स्वास्थ्य, रिश्तों में परेशानी या किसी को खो जाने के डर आदि से दुखी और निराश होना आम बात है। ये इन घटनाओं के जाने-माने परिणाम है, जोकि व्यक्ति के जीवन में आते-जाते रहते हैं।

हाँलांकि, जब ये घटनायें व्यक्ति की सोच और बरताव को इतना ज्यादा प्रभावित कर देती है कि, इससे उसके रोजमर्रा के कामों पर लगातार 2 हफ्तों तक प्रभाव रहता है, तब इसे असामान्य माना जाता है। यह उन लोगों में विशेष तौर पर होता है, जिनको किसी के खो जाने से अत्यधिक दुख होता है, और जो अपनी भावनाओं को इस तरह बताते है जैसे की वह किसी डिप्रेशन से ग्रस्त है। हाँलांकि दोनो में सामान्य लक्षण दिखायी देते हैं जैसे अत्यधिक दुख या काम में मन न लगना।  शोक व वियोग, डिप्रेशन से अलग होते हैं, जिनकी अलग-अलग पहचान करके उन्हें आवश्यक मदद और इलाज दिया जाना चाहिये।

• शोक व वियोग में, दुख की भावना उतार-चढ़ाव के साथ आती है। इसमें बीच-बीच में गुजरे हुये व्यक्ति की कुछ अच्छी यादें भी शामिल होती हैं। जबकि, डिप्रेशन में उदासीनता तथा मन न लगने की भावना कम से कम लगातार 2 हफ्ते तक बनी रहती है।

• शोक व वियोग में, आमतौर पर आत्मसम्मान बना रहता है। जबकि डिप्रेशन में खुद के बेकार होने की तथा दोष की भावना बनी रहती है।

जब शोक डिप्रेशन के साथ होता है तो यह ज्यादा गंभीर होता है, और ज्यादा लंबे समय तक चलता है।

डिप्रेशन कितने प्रकार का होता है?

एक व्यक्ति अलग-अलग तरह के डिप्रेशन से ग्रसित हो सकता है। इसको लक्षणों की गंभीरता और समय के आधार पर बाँटा जा सकता है। डिप्रेशन के कुछ रूप विशेष परिस्थितियों में हो सकते हैं, जिनकों उसके अनुसार बाँटा जा सकता है।

लक्षणों की गंभीरता और समय के आधार पर अवसाद मुख्य रूप से दो तरह के होते हैं।

1. मेजर डिप्रेशन या क्लिनिकल डिप्रेशन: इसे आमतौर पर डिप्रेशन के नाम से संबोधित किया जाता है। इसमें व्यक्ति को डिप्रेशन के लक्षण, दिन के ज्यादार समय या पूरे दिन लगभग 2 हफ्तों तक रहते हैं। इसमें व्यक्ति दुख की भावना, किसी चीज में मन न लगना या खुद के बेकार होने की भावना से पीड़ित रहता है।

दि अमेरिकन साईकेट्रिक एसोसिएशन- The American psychiatric association (APA) ने हाल ही में जारी हुये प्रकाशन (पब्लिकेशन) में लक्षणों से जुड़े डिप्रेशन के विभिन्न रूपों को और अधिक वर्गों में बाँटा है।

मेजर या क्लिनिकल डिप्रेशन के प्रकार के बारे में जाने

2.परसिसटेंट डिप्रेशिव डिस्आर्रडर (पीडीडी) या डिस्थीमिया: पीडीडी डिप्रेशन का एक गंभीर रूप है, जोकि लगभग 2 साल तक बना रहता है। पीडीडी से  पीड़ित व्यक्तियों में डिप्रेशन के लक्षण हल्के होते हैं, और ज्यादातर व्यक्ति रोजमर्रो के कामों को करने योग्य होते है, लेकिन अधिकतर समय वह दुखी ही रहते हैं। इन लोगों को बीच-बीच में डिप्रेशन के गंभीर एपिसोड हो सकते हैं।

कुछ तरह के अवसाद जिंदगी में घटी घटनाओं के आधार पर बाँटे जाते हैं।

1. पेरिपार्टम डिप्रेशन: इस तरह के डिप्रेशन गर्भावस्था के दौरान या बच्चा होने के कुछ हफ्तों या महीनों के बाद होते हैं। यह स्थिति बेबी ब्लूज की तुलना में अलग और गंभीर होती है। बेबी ब्लूज में महिला डिप्रेशन और चिंता के हल्के लक्षणों को महसूस करती है, जोकि 2 हफ्तों के अंदर खत्म हो जाते हैं। पेरिपार्टम डिप्रेशन में महिला में मध्यम से लेकर गंभीर लक्षण विकसित होते हैं, जोकि उसकी खुद की और बच्चे की देखभाल करने की क्षमता को प्रभावित करते हैं।

2. मौसमी डिप्रेशन: इस तरह के डिप्रेशन मौसम के बदलने के साथ विकसित होते हैं, जोकि ज्यादातर सर्दियों में होते है जब धूप कम होती है। ज्यादा नींद, समाज में मिलने-जुलने में कमी और अधिक वजन भी इसको बढ़ावा देते हैं। मौसम में बदलाव के साथ डिप्रेशन चला जाता है, और सर्दियों की शुरुआत के साथ वापस आ जाता है।

3. प्रीमेन्स्ट्रुअल डिस्फोरिक डिसऑर्डर (PMDD): इसको प्रीमेंस्ट्रुअल सिंड्रोम (PMS) का एक गंभीर रूप माना जाता है। डिप्रेशन के लक्षण ओव्यूलेशन के बाद शुरू होते हैं और मासिक धर्म की शुरुआत के साथ समाप्त हो जाते हैं।

डिप्रेशन किस कारण होता है?

डिप्रेशन का सटीक कारण समक्षने के लिए कई शोध चल रहे हैं। ऐसे कई कारण हैं, जिन्हे डिप्रेशन का कारण माना जाता है।

• आनुवाँशिक (जेनेटिक) कारक: उन लोगों में डिप्रेशन की समस्या अधिक पायी गयी है, जिनके परिवार के किसी सदस्य को यह समस्या है। डिप्रेशन की समस्या उत्पन्न करने वाले जींस की पहचान करने के लिए कई अध्ययन किय गये है।

• दिमाग में जैविक (बायोलोजिकल) बदलाव: डिप्रेशन से ग्रसित लोगों के दिमाग में कुछ बनावटी बदलाव पाये गये हैं। इन बदलावों के महत्व का अध्ययन अभी भी किया जा रहा है।

• दिमाग के रसायनों (केमिकल) में बदलाव: न्यूरोट्रान्समीटर नामक दिमागी रसायन संकेतो को दिमाग के अन्य भागों तक पहुँचाने का काम करते है। मनोदशा (मूड) के लिए जिम्मेदार, न्यूरोट्रान्समीटर में बदलाव, डिप्रेशन के विकसित होने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते है।

• हार्मोनल संतुलन में बदलाव: ऐसा पाया गया है कि कुछ परिस्थितियाँ, जो हार्मोनल संतुलन में बदलाव के साथ जुड़ी होती हैं, डिप्रेशन के विकास में ट्रिगर का काम करती हैं। यह स्थितियाँ, गर्भावस्था, बच्चा होने के बाद की महावारी, महावारी से पहले की अवधि, महावारी का बंद होना या थाईराइड समस्यायें आदि हो सकती हैं।

डिप्रेशन के लक्षण और संकेत क्या है?

उदास और दुखी महसूस करना डिप्रेशन का एक हिस्सा मात्र है। डिप्रेशन में मुख्य तौर मनोदशा (मूड) में लगातार नकारात्मक बदलाव बना रहता है, जिससे कई सारे लक्षण उत्पन्न हो जाते हैं, जो जीवन के हर पहलू को प्रभावित करते हैं। अवसाद (डिप्रेशन) में ये लक्षण हर समय और हर दिन लगभग 2 हफ्तों तक रहते हैं। ये लक्षण इस प्रकार हैं:

दिनभर उदासी, दुख और खालीपन की भावना होना।

किसी भी शौक और रोजमर्रा के कामों में रुचि खत्म हो जाना।

जीवन में अपने महत्व को खो देना या दोष की भावना पैदा होना।

बेचैनी, झुंझलाहट या गुस्से के साथ मनोदशा (मूड) में चिड़चिड़ापन होना।

वजन से संबंधित समस्यायें जैसे वजन का घटना या बढ़ना।

नींद से संबंधित परेशानियाँ जैसे सोने में दिक्कत, नींद को बनाये रखनें में दिक्कत, सुबह जल्दी उठ जाना या ज्यादा सोना।

सोचने और फैसले लेने में दिक्कत, धीमी और बाधित सोच, ध्यान में कमी या दुविधा होना।

खानपान की आदत में बदलाव जैसे भूख कम लगना या खाने की ज्यादा इच्छा होना।

शरीर और पेट में दर्द या खिंचाव, या सिर में दर्द होना।

हाजमें की समस्या होना।

ऊर्जा की कमी और थकावट का एहसास होना।

चालढाल और काम में धीमापन होना।

मौत और आत्महत्या का विचार आना।

डिप्रेशन से ग्रसित लोगों में गंभीर लक्षण पाये जाते हैं, जो उनके रोजमर्रा की जिंदगी और संबंधों पर प्रभाव डालते हैं।

बच्चो और किशोरों में डिप्रेशन के लक्षण  

बच्चो और किशोरों में डिप्रेशन के लक्षण और संकेत वयस्कों की तरह ही होते हैं, लेकिन इनमें कुछ अंतर हो सकते हैं।

बच्चों में डिप्रेशन के लक्षणों में उदासी, चिड़चिड़ापन, माता-पिता के साथ सटे रहने की आदत, दर्द, स्कूल जाने से मना करना, वजन का कम होना आदि होते है।

किशोरों में यह लक्षण उदासी, चिड़चिड़ापन, बेकार और नकारात्मक सोच, गुस्सा, स्कूल में खराब उपस्थिति और प्रदर्शन, बहुत संवेदनशील और गलत समझे जाने की चिंता, नशीले पदार्थों और एल्कोहल का सेवन, अधिक खाना और सोना, खुद को नुकसान पहुँचाना, सामान्य काम में रुचि न रखना, और समाज में मिलने-जुलने से बचना आदि हो सकते हैं।

डिप्रेशन आपके जीवन को किस तरह प्रभावित कर सकता है या इससे क्या हो सकता है?

डिप्रेशन एक गंभीर स्थिति होती है, जो व्यक्ति के जीवन पर तथा उसके परिवार के सदस्यों पर गहरा प्रभाव डालती है। यह व्यक्ति के व्यक्तिगत और पेशेवर संबंधों, दोनों को प्रभावित कर सकती है, जोकि आगे चलकर व्यक्ति की मानसिकता और आत्मविश्वास पर गहरा असर डालती है। यह व्यक्ति को स्कूल, कामकाज और समाज में अच्छे प्रदर्शन की क्षमता को प्रभावित करता है।

यह समस्याये एक दुष्चक्र के रूप में काम करती हैं, जिससे दोष की भावना, बेकार होने की भावना आदि समस्यायें बढ़ जाती हैं, जोकि लक्षणों को और अधिक बढ़ाती है। यदि इसका समय पर इलाज न किया जाये तो, इससे शारीरिक और मानसिक समस्यायें पैदा हो सकती हैं, जैसे:

वजन का बढ़ना जोकि व्यक्ति में दिल की बीमारी, डायबिटीज पैदा करता है।

मादक पदार्थों का सेवन जैसे एल्कोहल या नशीली दवाईयाँ (ड्रग्स)।

अन्य दिमागी बीमारियाँ जैसे चिंता, अचानक घबड़ा जाना, विकार या समाज में मिलने-जुलनें में भय।

समाज से अलग-थलग होना।

खुद को नुकसान पहुँचाना जैसै, काटना या मारना।

बीमारी के कारण समय से पहले होने वाली मौत।

आत्महत्या का विचार आना या आत्महत्या करने के कोशिश करना।

डाक्टर से सम्पर्क कब करना चाहिये या चिकत्सकीय सहायता कब लेनी चाहिये?

यदि आपको लगता है कि, आपके अंदर डिप्रेशन के लक्षण मौजूद हैं, तो जितना जल्दी हो सके उतनी जल्दी डाक्टर या मनोरोग चिकत्सक से सम्पर्क करें। यदि आपको लगता है कि आपके परिवार का कोई सदस्य या मित्र डिप्रेशन से गुजर रहा है, तो उनसे बात करने की कोशिश करे, ओर उनकों चिकित्सकीय सहायता लेने के लिए मनायें।

यदि आपको लगता है कि, आप के खुद अंदर डिप्रेशन के लक्षण मौजूद हैं, तो यह बेहतर है की आप लोगों से बातचीत करें। वह कोई भी हो सकता है, जैसे अपका दोस्त, परिवार का कोई सदस्य, अपका पसंदीदा व्यक्ति, या गुरु या फिर धार्मिक गुरु जिस पर आप विश्वास करते हों। जब व्यक्ति के मन में आत्महत्या का विचार या खुद को नुकसान करने का विचार आये, तो उसे तुरंत चिकित्सकीय सहायता लेनी चाहिये। यदि परिवार के किसी सदस्य या मित्र को इसके बारे में जानकारी मिले, तो उसे मरीज को तुरन्त डाक्टर के पास ले जाना चाहिये।

डाक्टर, अस्पताल या मनोचिकित्सक से संपर्क करें।

जरूरत पड़ने पर नीचे दिये गये सुसाइड हेल्पलाईन नंबर पर संपर्क करें।

1. आसरा (AASRA)

संपर्क: +91 22 2754 6669

समय: हफ्ते के सातों दिन (सुबह 9 बजे से शाम 9 बजे तक)

 

2. स्नेहा फाउंडेशन इंडिया अवेलेबल (Sneha Foundation India available)

संपर्क: +914424640050

समय: हफ्ते के सातों दिन (24 घंटे)

 

3. रोशनी (Roshni)

संपर्क: +914066202000/+91407904646

समय: सोमवार से शनिवार (सुबह 11 बजे से शाम 9 बजे के बीच)

 

4. कनेक्टिंग (Connecting)

संपर्क: +919922001122

समय: हफ्ते के सातों दिन (दोपहर 2 बजे से शाम 8 बजे तक)

 

5. वांड्रेवाला फाउंडेशन (Vandrevala Foundation)

संपर्क: 18602662345

समय: हफ्ते के सातों दिन (24 घंटे)

डिप्रेशन की पहचान कैसे की जाये?

डिप्रेशन की पहचान डाॅक्टर निम्न तरह से करते है।

• लक्षणों की जानकारी लेना: डाॅक्टर आपसे शारीरिक समस्या, शिकायत की अवधि, परिवार में कोई मानसिक स्थिति या समस्या की पूरी जानकारी लेते हैं। यह सामान्य चिकित्सक द्वारा किया जा सकता है, जोकि आखिर में आपको किसी विशेषज्ञ के पास भेजते है।

• शारीरिक परिक्षण: किसी भी शारीरिक समस्या को पहचानने के लिए डाक्टर शारीरिक परिक्षण कर सकते है।

• खून की जाँच: स्वास्थ्य की सामान्य स्थिति या थाईराइड की समस्या का पता लगाने के लिए डाक्टर खून की कुछ जाँचे करा सकते है।

• मानसिक रोगों का आँकलन: यह मनोरोग विशेषज्ञ द्वारा किया जाता है। वह आपके लक्षणों, विचारों, भावनाओं और बर्ताव की जानकारी विस्तार से लेते हैं।

डिप्रेशन की पहचान को निश्चित करने के लिए चिकित्सक डायग्नोस्टिक एंड स्टैटिस्टिकल मैनुएल आफ मेंटल डिस्आडर्स (Diagnostic and Statistical Manual of Mental Disorders- DSM-5) में दिये गये अमेरिकन साइकियाट्रिक एसोसिएशन (American Psychiatric Association) के दिशा-निर्देशों का पालन करते हैं, जोकि इस प्रकार हैं:

लक्षणों से जुड़े डिप्रेशन की पहचान के लिये एक व्यक्ति में 2 हफ्तों तक निम्मलिखित कम से कम 5 लक्षण होने चाहिये।

पूरे दिन उदासी की भावना होना।

रोजमर्रा के कामों में मन न लगना।

व्यक्ति के जीवन में बेकारी या दोष की भावना को होना।

वजन की समस्या जोकि वजन का बढ़ना या कम होना हो सकता है।

नींद की समस्या जैसे नींद उड़ जाना या नींद ज्यादा आना।

सोचने और फैसले लेने में परेशानी, धीमी सोच, ध्यान भटकना या दुविधा होना।

जोश का कम होना और थकावट महसूस करना।

चलने फिरने और काम करने में धीमापन।

आत्महत्या और म्रत्यु के विचार आना।